Only after last tree is cut down. The last of the water drop is poisoned. The last animal destroyed. Only then will you realize, you can't eat money............. Indian Prophecy
Sunday, February 26, 2012
Sunday, February 19, 2012
साधारण यात्रा
Friday, February 3, 2012
Tuesday, January 17, 2012
गाँधी, क्या से क्या हो गया देखते देखते
Friday, December 23, 2011
Journey throgh Life
Thursday, December 22, 2011
मुझे भी भारत रत्न दो
आजादी के बाद के इतिहास में शायद ये पहला पहला मौका होगा जब भारत रत्न सम्मान पर इतनी चर्चा सुनने में आती है. शायद ही कोई सप्ताह ऐसा छूटता होगा जिसमे इस चर्चा से भेंट न होती हो. पंडित से लेकर निरक्षर तक भारत रत्न के विषय में बेबाकी से अपने विचार रखता मिल जाएगा. प्रारंभ में बहुत अच्छा लगा था कि देर से ही सही देश का आम आदमी इन मामलों को लेकर भी जागरूक हो रहा है. अब सिर्फ चंद लोग फैसला नहीं लेंगे कि किसे ये सम्मान मिलाना चाहिए और किसे नहीं, एक बयार चलेगी जो हर दिल को छू कर निकलेगी और कहेगी कि ये है वो इंसान जिसने राष्ट्र के विकास में गंभीर योगदान दिया है, बस अब घोषणा कर दो. वैश्विक द्रष्टिकोण से मालूम नहीं किन्तु विश्व की १/६ आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाले इस सम्मान का महत्व स्वयं सिद्ध है.
Ram
Tuesday, December 13, 2011
From "History" page of Landau Institute for Theoretical Physics
Sunday, December 11, 2011
मूलभूत शिक्षा
रूस में रक्त क्रांति (प्रारंभ १९०५) से भी पूर्व जो अध्यापक बच्चों को किसी भी प्रकार की शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना देते थे उनके लिए साइबेरिया भेजने तक की कठोर सजा दी जाती थी, ऐसे अध्यापक की लोक समाज में प्रखर आलोचना होती थी और उन्हें घ्रणा की द्रष्टि से देखा जाता था. महाभारत काल में भी शिष्यों की पिटाई पर मृत्यु दंड के प्रावधान का उल्लेख है. लेकिन हमारे यहाँ पहले दिन की सुरुआत समझावन लाल से ही होती है. हर कक्ष में अध्यापक वजह-बेवजह बच्चों के स्वाभिमान की ऐसी तैसी करते मिल जायेंगे. घर परिवार से सम्बंधित झुंझलाहट भी अक्सर यहीं निकलती है. समझ गयी तेल बेचने, बच्चों ने पाठ नहीं याद किया या गुरु जी अनुत्तरित हैं पिटेंगे क्षात्र. हर समस्या का समाधान डंडे से होता है. जो जितना गरीब है उतना ज्यादा पिटेगा. घर में भी हालत विपरीत नहीं होते, बड़े नुकसान करें या बच्चे आफत बच्चों के सर फूटनी है. बच्चों के आत्म सम्मान (watch Brothers Karamazov) को मिट्टी में मिलाने का काम परिजन बड़ी जिम्मेदारी से निभाते हैं. अपने पराये का ज्ञान सर्वप्रथम बच्चों को माँ ही देती है.
नतीजतन ५वीं गुजरते गुजरते अधिकांश बच्चों का शिक्षा से लगाव मर चुका होता है. आगे बढ़ना भी चाहें तो उनकी नींव में राख और गौरव में भूसा भरा होता है. घर में मूलभूत सुविधाओं का अभाव आगे चलकर धन के प्रति अप्रतिम लगाव और मानवीय असहिष्णुता की पहली सीढ़ी का निर्माण करता है, ये कहना आप को भी यहाँ असमसामयिक लगेगा.
Monday, October 24, 2011
अथ शोध यात्रा
मित्र प्रगतिशील है इसलिए शोध क्षात्र से सच्ची सहानुभूतिपूर्ण भारी गले से अगले महीने के मुहूर्त में शादी का निमंत्रण दे फ़ोन रख देता है। उसे मालूम है कि चाह कर भी ये ५०० किमी दूर उसकी शादी में शामिल होने नहीं आने वाला। सुबह के सात बज चुके हैं, शोध क्षात्र ऊंघते हुए कंप्यूटर पर "job submit" कर दहेज़ (कु)प्रथा को कोसता हुआ बिस्तर का रुख करता है।
जारी...
Saturday, October 8, 2011
८४ हजार जीरो, वाह रे युवा....
Monday, September 26, 2011
रेलम पेल से त्रस्त? केरल से सीखो
कोच्चि। देश की आबादी नियंत्रित करने के लिए क्या यह उपाय सही होगा? केरल में यदि किसी पति ने पत्नी को तीसरे बच्चे के लिए गर्भवती किया, तो उसे जेल की हवा खाना पड़ सकती है! राज्य सरकार इसे लागू करेगी या नहीं, यह बाद में तय होगा, लेकिन केरल महिला संहिता विधेयक 2011 में कुछ ऐसा ही प्रावधान किया गया है। इसे न्यायमूर्ति वीआर कृष्ण अय्यर की अध्यक्षता वाली 12 सदस्यीय कमेटी ने मुख्यमंत्री को सौंपा है।
कमिशन ऑन राइट्स एंड वेलफेयर ऑफ वुमेन एंड चिल्ड्रन के मुताबिक तीसरे बच्चे की संभावना के तहत पिता पर न्यूनतम दस हजार रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा या तीन महीने की साधारण जेल होगी। साथ ही सरकारी सुविधाएं और फायदे अभिभावकों को नहीं दिए जाएंगे। हालांकि बच्चों को किसी प्रकार के अधिकार से वंचित नहीं रखा जाएगा। आयोग ने कहा है कि नया प्रस्ताव बच्चों के बेहतर लालन-पालन के लिए प्रभावी होगा।
आयोग ने 19 साल की उम्र में शादी करने और बीस वर्ष की उम्र में मां बनने वाली महिलाओं को प्रोत्साहन राशि के तौर पर पांच हजार रुपए देने का भी सुझाव दिया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकारी और निजी अस्पतालों में सुरक्षित गर्भपात मुफ्त किया जाना चाहिए।
आयोग ने कहा है कि किसी को भी धर्म या राजनीति की आड़ में 'जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम' में छूट नहीं दी गई है। धर्म, क्षेत्र, जाति या किसी अन्य आधार पर किसी व्यक्ति को ज्यादा बच्चे रखने का अधिकार नहीं है। आयोग का गठन राज्य सरकार द्वारा सात अगस्त 2010 को किया गया था। जिसमें महिलाओं और बच्चों के अधिकार और दायित्व संहिता तैयार करने को कहा गया था।
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थोड़ी समझ परिणाम बड़ा, भारत सरकार के काम की चीज नहीं, वो अभी स्पेक्ट्रम बाँट रही और खेल दिखा रही है। राम को जेल की हवा और रावण को मलाई(जनता का खून) खिला रही है।
Friday, September 23, 2011
तराजू
इतिहास ने खुद को फिर से दोहराया, इस बार मेरा पलड़ा हल्का था.......
Tuesday, August 30, 2011
भ्रष्टाचार, अन्ना, समाज, नेता और राष्ट्र (भाग 2)
तयशुदा तिथि के अनुसार अन्ना का अनशन शुरू हुआ, प्रशाशन को जो मूर्खताएं करनी थीं कीं। बंदी बनाने से लेकर सारी शर्तें स्वीकार करने तक सबकुछ अन्ना हजारे के अनुरूप हुआ और कुछ भी सरकार के लिए बेहतर न हो सका। सत्ता पक्ष ने अंतिम सांस तक आन्दोलन को न तो सहजता से स्वीकार किया और न ही उसकी गंभीरता को समझने का प्रयास किया। विपक्षी दलों ने भी विषय की जितनी उपेक्षा की जा सकती थी की। किसी भी जिम्मेदार राजनेता को वो बात समझ न आ सकी जो सामान्य अशिक्षित नागरिक को भी आसानी से समझ आ सकती थी। बड़प्पन(लाचारी) विपक्षी दलों का, कि कुछ निरंकुश क्षेत्रीय दलों को छोड़ कर किसी दल ने अपने विरोधियों से निबटने के कांग्रेसी/सरकारी तरीके को नकारा नहीं तो सहयोग भी नहीं दिया। कुछ दिनों पहले की अन्ना और अहंकारी राजनेताओं के बीच की लड़ाई बढ़कर आमआदमी और सरकार के बीच तक पहुँच गयी। "परिवर्तन प्रकृति का नियम है" को भूलकर "संविधान और संसद की सर्वोच्चता और उसकी रक्षा" जैसी बातों की राजनीति सदा की भांति चलती रही.
संविधान एक समाज को सुचारू रूप से चलने का साधन न होकर जैसे सर्वशक्तिमान ईश्वर के वचन हों। समाज और देशकाल में परिवर्तन होगा तो संविधान में परिवर्तन करना ही पड़ेगा। ६० साल पहले लिखा गया संविधान उस समय के समाज के परिद्रश्य में बनाया गया था, वो उस समय के भविष्य की परिकल्पना थी। आज के परिद्रश्य में हम पर परिपक्व चिंतन की मजबूरी और जिम्मेदारी है, ताकि हम बेहतर कल की परिकल्पना कर सकें। तकनीकी से लेकर मानव व्यवहार तक कोई चीज ६० वर्ष पूर्व, जैसी आज है, परिकल्पित भी न रही होगी।
रही संसद की बात तो इस आन्दोलन ने सिखा दिया है कि जहाँ क्षण भर में चेहरे बदलते हों लोग ५ वर्षों में सिर्फ एक बार, वो भी वैकल्पिक, निर्णय नहीं लेंगे बल्कि समयानुरूप जब आवश्यक होगा और उसे अपने चयनित प्रतिनिधि को अपने वैचारिक सुझाव देने होंगे तो देगा। बल्कि उस निर्णय में संशोधन भी कर सकेगा तो और भी बेहतर होगा। संसद को उस सुझाव को सुनना समझना ही नहीं उस पर नीतिसंगत अमल भी करना होगा।
हम सब जानते हैं कि राजनेताओं की मनमानी न चली, अन्ना के अनशन को वैश्विक समर्थन और सहयोग मिला। अन्ना हजारे, जिन पर ६ महीने पहले सिर्फ बुद्धिजीवी वर्ग विचार व्यक्त किया करता था, लोगो के दिल की धड़कन बन गए। आन्दोलन की लोगो के दिलों पर पैठ के लिए ये उदाहरण ही काफी होगा कि जिस देश में क्रिकेट एक धर्म है उसकी शायद ही इन दिनों कोई चर्चा हुई हो और बहुतों को तो ये भी नहीं मालूम होगा कि भारतीय टीम इंग्लैंड की टीम से ०-४ से टेस्ट मैच हारी है। समाज के हर वर्ग में हलचल थी ये बताना व्यर्थ है। १२ दिन के अनशन ने हर वो विचार बदला जो दकियानूस था और तर्कसंगत न था।
इस सारे घटनाक्रम ने तीन बातें स्पष्ट कर दीं एक "हमारा वर्तमान प्रधानमन्त्री बेहद लाचार, मजबूर और गौरवहीन है।" दूसरा "हमारा कथित भविष्य का प्रधानमंत्री गैरजिम्मेदार, विवेकशून्य और अहंकारी है." तीसरा "प्रधानमंत्री के अधिकाँश सहयोगी निरंकुश, असामाजिक और कथित रूप से भ्रष्टाचार में लिप्त हैं/थे।" एक बात जो मुझे दिखी वो ये कि हमारे समाज के बुद्धिजीवी वर्ग को प्रस्तुत करने के लिए कुछ पत्रकार और कुछ वकील ही हैं, ये परिद्रश्य बदलना होगा.
खैर घूम फिर कर बिल पारित हुआ और संसद ने छोटा ही सही लेकिन सकारात्मक और वर्तमान मांग को ध्यान में रखकर कदम उठाया। संसद की कार्यवाही देखकर कोई भी साधारण मनोविज्ञानी कह सकता था कि, अनुपस्थित लोगो की तो भूलो, उपस्थित माननीय सदस्यों में शायद ही कोई उस बहस में उत्साह से हिस्सा ले रहा हो। बहस तो बहाना था लोग गंभीर बिन्दुओं पर बात न कर शरद यादव के बडबोलेपन और बेकार के भाषण पर तालियाँ पीट और अट्ठाहस लगा रहे थे। सच पूछो तो किसी बिंदु के समर्थन का मतलब बहस की व्यर्थता थी और विरोध का किसी में साहस न था। बेहतर सुझाव तो राहुल गाँधी की भांति सदन से नदारद थे।
अन्ना और उनकी टीम को इस अभियान में सफलता तो मिली लेकिन जन सैलाब घटते ही टीम के सदस्यों का दमन शुरू हो गया। देश के नागरिक इस बात पे खुश हैं कि अब देश भ्रष्टाचार मुक्त हो जायेगा। कुछ बुद्धिजीवियों का कहना है कि जन लोकपाल बिल जादू की छड़ी नहीं है जो भ्रष्टाचार को मिटा दे। ये बात शायद हर भारतीय जानता है, लेकिन वो ये भी जानता है कि जादू की छड़ी के इन्तजार में हाथ में हाथ रखकर कर बैठे रहना मूर्खता है। पहल तो करनी ही होगी। वैसे भी जादू की छड़ी आने न पाए इसके लिए ही हमारी सभ्यता ने हजारों वर्षों का अविश्वसनीय क्रमगत विकास किया है।
देश के सामान्य समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार को अगले अंक में चिन्हित करेंगे.....
Tuesday, August 2, 2011
मेहमान
थोड़ी देर पहले ही तो हम लोग गंगा किनारे शाम की सैर को निकले थे। वो भी चुप थे और मैं भी खामोश थी। अन्दर से आवाज़ तो निकलती थी लेकिन गले से बोल ना फूटते थे। उनका हाल मुझसे जुदा न था। कितनी सारी बातें, कितने अरमान हिलोरें मार रहे थे लेकिन कुछ भी बाहर तो न आता था। जी करता था हांथो में उसका चेहरा ले आँखों में आँखें डाल इस पावन गंगा में उतर जाऊं। अजीब ख़याल था। किनारे पहुचे तो वो गंगा की ओर और मैं विपरीत दिशा में मुह कर के बैठे थे। प्रकृति की छटा निराली थी ये एहसास तो बहुत देर से हुआ, मुझे तो बस ये ही ख़याल था की उसके हाथ की दूरी मेरे हाथ से २ सेमी से ज्यादा न रही होगी। कितनी मन्नतें मना डालीं एक स्पर्श की चाह में, माथे पर पसीने की बूंदे छलक आयीं लेकिन ये दूरी तय न हो रही थी। अचानक वो मेरी गोद में सर रख उगते हुए चाँद की सराहना करने लगा। मेरा दिल उछल कर गंगा में छलांग लगा बैठा। थोड़ी देर बाद जब उखड़ी सांसें सामान्य हुईं तो मुझ पर एक मीठी ईर्ष्या का लेप चढ़ गया। मैं इतने सपने संजोने लगी जितने आज तक देखे भी न थे। प्राण पुकारते थे जब भी निकलें बस इसी अवस्था में। घंटों बीत गए होंगे, उसके सर का भार जैसे फूल से भी हल्का था। सैर ख़त्म कर घर वापस जाने की बात निकली तो जैसे शरीर में जान ही न रह गयी। मेरी प्राणप्रिय गिलहरी हमेशा की भांति मेरी हर हलचल की गवाह थी लेकिन आज ये पहला मौका था जब मैं अपनी भावनाएं उसके साथ साझा नहीं कर पा रही थी।
राम
Thursday, July 21, 2011
देर
खाना त्याग प्राण देने का प्रण होता तो घर ही न जाती। थोडा बहुत खाना पेट में गया तो कुछ साहस बंधा, रात में सभी लोगो को इकठ्ठा कर एक ही सांस में कह बैठी, "मुझे गैर जाति के लड़के से असीम प्रेम है, और मैं उसी के साथ शादी करना चाहती हूँ। अन्यथा आजीवन अविवाहित ही रहना पसंद करुँगी। मैं अपना सर्वस्व उसी को न्योछावर करती हूँ।" मैंने दहेज़ प्रथा और समाज की अन्य कुरीतियों के प्रति अपने विचार रखे, जिनका मेरे माता-पिता स्वयं निष्ठां से आजीवन पालन करते आये थे। मुझे याद आता है कि मेरे पिता ने एक बार स्वयं कई महीनो तक मुझसे बात नहीं की थी क्युकी मैंने गाँव की उस लड़की से मुलाकात कर ली थी जिसके भाई ने प्रेम विवाह किया था।
अविश्वसनीय तरीके से बुजुर्गों ने रूढ़ियों की मजबूत दीवार को तोड़ने में क्षण भर की देरी न की। जीवन भर के अनुभव से उन्होंने जो विश्वास और सिद्धांत निर्मित किये थे, मेरे परिकल्पित सुख के लिए रेत के महल से ढह गए। और उनकी जगह ऊंचे और परिपक्व ख्यालों की स्थापना हुई। रात काफी बीत चुकी थी सो आगे का कार्यक्रम सुबह तक के लिए स्थगित हुआ। सुबह होते ही लोग, अपनी वार्गिक श्रेष्ठता को ताक पर रख, मेरे रिश्ते की बात करने निकल पड़े।
दो घंटे भी न बीते होंगे मुझे खबर मिली कि "जो मेरे नाम का हर घडी दम भरता था, जो मेरे बिना जीने को स्वप्न में भी स्वीकार न करता था, जो मेरे समाज से भिन्न ख्यालों का असीम आदर करता था, जो मुझे अपना खुदा कहता था, उसे पाने में मैंने देर कर दी।" पीछे मुड कर देखा तो पाया कि अपने जिन सिद्धांतो को मैं शहर में तिलांजलि दे कर गाँव आई थी वो मेरे पीछे गाँव आ पहुचे हैं और मेरे परिवार वालों के सिद्धांतों के साथ जख्मी पड़े कराह रहे हैं, और मेरा भविष्य असाध्य रोग से अभिशप्त हो अंतिम सांसें ले रहा है। जिस ईश्वर पर अटूट विश्वास था वो कायरों की माफिक मुझे मेरी ही बदहाली पर आंसू बहाता छोड़ नदारद हो चुका है। जीवन के हर पहलू में तर्क खोजने वाली मैं आज असंगत हो सर्वनाश के चौराहे पर बिल्कुल असहाय सी खडी थी। और मेरा भूत मेरी दुर्दशा पर अट्ठाहास लगा रहा था।
राम
