Sunday, February 19, 2012

साधारण यात्रा


बड़े भाई की आँख का ऑपरेशन कराने के लिए चित्रकूट जाना था. इलाहाबाद से ज्यादा दूर ना होने और पूर्व निर्धारित कार्यक्रम न होने के कारण साधारण डिब्बे से यात्रा का विचार हुआ. वैसे तो हमारा इलाहाबाद शहर ही आज कल दुर्गति और अव्यवस्था का शिकार है, किन्तु उत्तर भारतीय रेल स्टेशन की कुरूपता लम्बी और गंभीर है. चारो तरफ प्लास्टिक बैग और मल से पटे रेल पथ न चाहते हुए भी आप के नजले जुकाम पर भारी पड़ते हैं और एक कदम भी ध्यान बंटने पर आप का पैर गन्दगी पर होता है. गलती से अगर कही बैठ गए हैं तो वो उत्तेजक गंध आप के गंतव्य तक भी पीछा नहीं छोड़ती.

इस सब से होते गुजरते लगभग एक घंटे के चिरंतम इंतज़ार के बाद ट्रेन आने पर जब मैं साधारण बोगी के दरवाजे पर पहुचा तो एक बारगी उससे आने वाली गंध के धक्के से दो कदम पीछे चला गया और उसी बीच कम से कम २० लोग उसी दरवाजे से प्रविष्ट हो गए. ख़याल आया कि मेरी यात्रा आवश्यक है, और शयनयान वाले डिब्बे में जाकर टिकिट टेलर की अभद्रता झेलना मुश्किल होगा अतः मैं उस स्वर्ग में सम्पूर्ण शक्ति झोंक प्रवेश कर गया. भीड़ बहुत होने के कारण असंतुलित होने पर सहारे के लिए मेरा हाथ दरवाजे के पास की चिलमची (washbasin) पर चला गया, मैंने पाया किया कि मेरी हथेली लोगो द्वारा थूके गए पान, गुटका और कफ से लथपथ है, उसी चिलमची पर लगे टेप से हाथ धुल नाक सिकोड़ता मैं आगे बढ़ा तो देखा कि शौचालय के दोनों दरवाजे खुले हैं और उनसे भयंकर दुर्गन्ध आ रही है, विस्मयकारी रूप से कई लोग जगह की कमी के कारण उन दरवाजो के पास खड़े थे और उनमे से एक दरवाजे बंद करने की नाकाम कोशिश कर रहा था. एक बार अन्दर घुसने पर भीड़ ने स्वयं ही मुझे बोगी के मध्य ला दिया, भाग्यवश मेरे पास ज्यादा सामान न था वरना सर पर रख के खड़ा होना पड़ता. पास से आती गरम आवाज ने पहला ध्यान खीचा.

खड़ा हुआ: भाई साहब ये सीट लेटने के लिए नहीं है, उठ के बैठ जाइए और लोगो को बैठने दीजिये.
लेटा हुआ: .........(करवट बदलता है).
खड़ा हुआ: भाई साहब उठ के बैठिये, महिलाओं और बच्चों को बैठने दीजिये.
लेटा हुआ: क्या है रे, तेरे बाप की सीट है? नहीं उठूंगा उखाड़ ले जो उखाड़ना है.
खड़ा हुआ: नहीं तेरे बाप की सीट है इसीलिए तू पैर फैला के सोया है.
लेटा हुआ: ऐसे नहीं मानेगा मादर चोद, (उठते हुए) भोसड़ी के एक शब्द बोल तू फिर मैं बताता हु मैं कौन हूँ.
खड़ा हुआ: अरे ओ रिंकू जरा बुलाओ तो सबको, देखो बहन चोद एक गुंडा पैदा हुआ है....


थोड़ी देर की बहस के बाद सब शांत हो जाते हैं. साधारण दर्जे का टिकिट ले शयनयान वाले डिब्बे में घुसने वालों की तरह कोई राजनीति की बातें करता न दिखा. सभी के मस्तक पर भय और अविश्वास की खिंची दो रेखाएं किसी ट्रेड-मार्क का एहसास करा रही थीं. मैं, विश्लेषण कर पाने में असमर्थ, कुछ लोगो से अनुरोध के पश्चात १/४ सीट पा थोडा आराम करता हुआ खुद को सबसे अलग दिखाने की कोशिश में आस पास अपने दांत बिखेरता हूँ किन्तु खिन्न चेहरे से युक्त लोगो को ये क्रिया बेगानी और बच्चो को डरावनी प्रतीत होती है इसलिए मैं सहम कर एक और नमूना प्रस्तुत करता हु और लैपटॉप निकाल जल्दबाजी में डाउनलोड किये हुए आँखों से सम्बंधित विभिन्न प्रकार के रोग, ऑपरेशन के तरीके और उनकी जटिलता के बारे में पढने का ढोंग करने लगता हूँ. किन्तु लोगो के मलिन कपड़ो, उनके सामान और खाने पीने के बाद फैलाई गयी गन्दगी से उठाने वाली गंध बीमार बनाती प्रतीत हुई. बोगी में चारो तरफ खांस रहे तेजहीन चेहरों को देख लग रहा था जैसे ये ट्रेन सीधे शमशान घाट जा रही है. कुछ ही क्षण बीते होंगे मेरा हाल भी वही हुआ जा रहा था, सर में तेज दर्द और खांसी. कारण दूर न था, गुस्से को ठंडा करता हुआ उठा...

मैं: इतने लोग आप के आस पास बैठे हैं और आप को तनिक भी ख़याल नहीं कि यहाँ बीडी नहीं पीनी चाहिए.
वो: .......(घूरते हुए) कौनो दिक्कत?
मैं: आप देख नहीं रहे लोग खांस खांस के परेशान हैं (बीच में ही)
तीसरा: किसी का पेट पिरायेगा(दर्द करेगा) तो कोई का करे
मैं: तो पेट दर्द का दवा लेना था...
वो: चलत ट्रेन मा दवा कहा से लावा जाए.
मैं: आप को पेट दर्द करेगा ट्रेन में इसलिए बीडी घर से लेके चले, दवा नहीं ले सकते थे.
तीसरा: जा आपन काम करा (घूरते हुए).
मैं: वैसे बीडी पेट दर्द का इलाज है ये किस डॉक्टर ने कहा?
वो: बहस न कर हमसे... तू पढ़त हा इतनी देर से हम मना किया?
मैं: ........................(!!!!)
महसूस करता हूँ कि कुछ और लोग मुझे घूर रहे हैं और मन ही मन मेरी पिटाई कर रहे हैं. उस पुरुष के आस पास बैठी महिलाएं खांस कर मेरे पढने से होने वाले नुकसान की पुष्टि करती हैं. फर्श पर बैठा वृद्ध पहले अपनी पाचन शक्ति का परिचय देता है फिर प्राचीन प्लास्टिक बोतल का झागयुक्त पानी मुह में उडेल देता है. 
               

Tuesday, January 17, 2012

गाँधी, क्या से क्या हो गया देखते देखते

यूं तो गाँधी खुद में एक विचारधारा थे. उनका हर कदम, उनके हर कथन आज भी शोध की विषयवस्तु हैं. और इतने वर्षों के चिंतन के बावजूद विद्वान उनके दिल के एक कदम भी करीब नहीं पहुँच सके. मैं ठहरा विज्ञान का क्षात्र अतः मुझसे तो आप वैसे भी मानवीय समझ की अपेक्षा मत कीजिये. आज अचानक स्नान करते वक्त प्राथमिक पाठशाला की प्रार्थना फिर वहां के गुरु जी और फिर वहाँ दी जाने वाली नैतिक शिक्षा याद आ गयी. पर सब कुछ घूम फिर के गांधी के उन तीन बंदरों की कहानी पर जा टिका. सोचा "बुरा मत देखो, बुरा मत कहो, बुरा मत सुनो" ... अचानक बचपन का एक सहपाठी चिल्ला चिल्ला के कहने लगा गुरु "बुरा मत देखो, बुरा मत कहो, बुरा मत सुनो येही कहा है न गांधी जी ने लेकिन बुरा सोचने और बुरा करने के लिए तो मना नहीं किया".... भयभीत होकर भागा तो पाया कि गरम पानी की मात्रा ज्यादा हो रही है. 
सोचने लगा "बुरा मत देखो" का मतलब होगा कि 'अगर कुछ सामने बुरा हो रहा है जो सर्वजन हिताय नहीं है तो आँख बंद कर उस होने की उपेक्षा कर वहाँ से निकल लिया जाए' या 'जो बुरा हो रहा है उसे रोकने के लिए वाजिब प्रयास किया जाय ताकि वो होना रुके और भविष्य में ऐसा होने की संभावनाएं कम हों'.
"बुरा मत कहो" का मतलब ये होगा कि 'चाहे सामने वाला जितना बुरा हो उससे हमेशा मीठी मीठी बातें ही की जाएँ, ऐसी कोई बात न कही जाए जो कडवी हो, भले ही सच कड़वा होता है' या 'बिना स्वार्थ के सत्य और उपयोक्त बात ही कही जाए जो सर्वसाधारण के हित में हो, भले ही वो तीखी और दिल दुखाने वाली हो'
"बुरा मत सुनो" का मतलब ये होगा कि 'दिल को बुरी लगने वाली बात न सुनो' या 'जो बात नुकसान करने वाली हो उसे ध्यान से सुन उचित विश्लेषण कर तार्किक और मूल्यों पर आधारित बात बुरा कहने वाले को समझाई जाये ताकि किसी कथन के परिणाम सुन्दर हों और सोच विकसित'
आप जानें "बुरा मत सोचो और बुरा मत करो" उपरोक्त दो प्रकार के विश्लेषणों में किसमे परोक्ष  रूप  से समाहित है. गांधी की गांधी जानें, लोक चलन में पहले प्रकार का विश्लेषण ही उपयुक्त दीखता है.

बताता चलूँ कि किशोरावस्था तक, इस नैतिक शिक्षा का, विभिन्न उम्र के लोगों द्वारा सुझाये निहितार्थों का निचोड़ एक ही था "सेक्स, सेक्स, सेक्स".

राम 
   

Friday, December 23, 2011

Journey throgh Life

Ganya, who was about to marry beautiful Nastasya Filipovna but was not in love with her, wrote a letter to Aglaya and passed it to her through Prince Myshkin. She asked Prince to read it.

"Tonight my fate will be decided. Tell me to quit it, and I will. A word from you would only indicate your kind attitude toward me, nothing more. Upon your words, I'll accept my poverty. I'll accept my desperate position with a smile... "

Aglaya: Enough. This person claims that my saying "quit it" won't compromise me or oblige me. This is supposed to be his written warranty. But he knows: If he quit it by himself, not expecting my approval and not making it known, I would probably become his companion. But his heart is dirty. He wants to get me in exchange for the loss of that hundred thousand. He has no shame. Give him this letter.

Prince: What should I tell him?

Aglaya: Nothing. It's the best answer.

Read it once more..... 
From the legendary novel IDIOT by Fyodor Dostoyevsky.

Thursday, December 22, 2011

मुझे भी भारत रत्न दो


आजादी के बाद के इतिहास में शायद ये पहला पहला मौका होगा जब भारत रत्न सम्मान पर इतनी चर्चा सुनने में आती है. शायद ही कोई सप्ताह ऐसा छूटता होगा जिसमे इस चर्चा से भेंट न होती हो. पंडित से लेकर निरक्षर तक भारत रत्न के विषय में बेबाकी से अपने विचार रखता मिल जाएगा. प्रारंभ में बहुत अच्छा लगा था कि देर से ही सही देश का आम आदमी इन मामलों को लेकर भी जागरूक हो रहा है. अब सिर्फ चंद लोग फैसला नहीं लेंगे कि किसे ये सम्मान मिलाना चाहिए और किसे नहीं, एक बयार चलेगी जो हर दिल को छू कर निकलेगी और कहेगी कि ये है वो इंसान जिसने राष्ट्र के विकास में गंभीर योगदान दिया है, बस अब घोषणा कर दो. वैश्विक द्रष्टिकोण से मालूम नहीं किन्तु विश्व की १/६ आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाले इस सम्मान का महत्व स्वयं सिद्ध है. 

एक दिन आया जब (शायद) अडवाणी जी ने पत्रकार वार्ता में अटल जी को ये सम्मान दिए जाने की आकांक्षा जाहिर की. अधिकाँश प्रधान मंत्रियों को जीते-मरते ये सम्मान मिला है, उन्हें भी ये सम्मान प्रदान किया जाना स्वाभाविक प्रक्रिया होता; भले ही उनके प्रधान मंत्रित्व में लोगो को रेडियो पर उनकी बोगस कवितायें सुननी पड़ती थीं. लेकिन अडवाणी जी ने वाजिब तरीके से अनुशंशा न कर मीडिया के सामने वाहवाही लूटते हुए अटल जी के भारत रत्न होने की संभावनाओं पर पलीता लगा दिया. इतना ज्वलंत विचार पहले किसी नेता के दिमाग में नहीं रेंगा था. नेताओं ने अपनी पार्टी के जुझारू नेताओं, जिनके सामने आज के नेताओं का कद बौना है, से बदला लेना सुरु कर दिया. नेता सुनते गाली देने वाली जनता ने इन सबको भी लपेटा.

अगले स्तर का छिछोरापन तब सुरु हुआ जब नेताओं की जगह सुशिक्षित(??) लोग लेने लगे. फिर क्या था हर गली नुक्कड़ पर सुझाव सुरु हुए, जिसे अपने घर में ख़त्म राशन का होश नहीं है वो भी अपनी संगत में दो चार नाम सुझा रहा है. भारत की संस्थापना और क्रान्ति के जनकों से लेकर लूटमार और डाकू तक सारे नाम सुझाए जा चुके हैं. शरद पवार और कबीर के बीच के सारे फासले मिट कर स्वच्छ लोकतंत्र की मुनादी कर रहे हैं. ५००० साल पुराने मुर्दे भी कब्रों और श्मशान घाट से उठ उठ कर अपने अपने नाम सुझा और दावेदारी पेश कर रहे हैं. राम-रावण, कृष्ण-कंश, भीष्म-ध्रितराष्ट्र सब एक दूसरे की सिफारिश कर रहे हैं.

हालत ये है कि अब तो "भारत रत्न" शब्द कान में पड़ते ही स्वाभिमान को ठेस पहुचने लगती है. लगता है कहीं दूर अँधेरे से कोई गालियाँ दे रहा है. कारण संभवतः किसी के द्वारा मेरा नाम न सुझाना होगा. सम्मान पाने का स्वाभाविक हकदार हूँ, राष्ट्र का कुछ ख़ास नुकसान नहीं किया, कर्म शून्य और बेरोजगार भी हूँ, घोटाले, बर्बरता, हत्या, बलात्कार और किसी भी प्रकार के शोषण करने का मौका हाथ नहीं आया और मेरे नाम से भारत की पहचान नहीं, भारत के नाम से मेरी पहचान है.       
Ram

Tuesday, December 13, 2011

From "History" page of Landau Institute for Theoretical Physics

Then came a phone call from a Kosygin’s (then the Prime Minister of the Soviet Union) aid: “How come 75? It is completely beyond me.” Well, a little bit of foot-dragging again. “Oh,” I explain, “It’s ve simple, tovarishch. We will have 15 sectors, each sector has 5 people. Just mult 15 by 5. You see? It is 75, isn’t it?” “Oh, sure,” he replied, “I got it.” After that call, it took only two days for Kosygin to sign the project.
So, when dealing with clerks, remember that they just need some logical construction. Tell him that 15 times 5 is 75, and all problems are solved.

Sunday, December 11, 2011

मूलभूत शिक्षा

जितने आर्थिक और तार्किक स्तरों में हमारा समाज वर्गीकृत है लगभग उतने ही स्तरों में हमारी मूलभूत शिक्षा भी. स्वभावतः उस स्तर की बात न करूँगा जिसका भार उठाने की क्षमता विलासी वर्ग तक सीमित हो. मुश्किलें वहाँ भी हैं लेकिन उनका विश्लेषण मेरे वश की बात नहीं. मैं तो उस वर्ग की बात करूँगा जहाँ बच्चे दोपहर के भोजन की आस में विद्यालय जाते हैं.

जिस राष्ट्र में किसान भूख और कर्ज के कारण आत्म हत्या कर रहे हों वहाँ मध्यांतर भोजन जैसी योजना का क्रियान्वयन नीति नियंताओं की परिपक्व दूरदर्शिता को प्रतिबिंबित करता प्रतीत होता है. ये बात गैर है कि यही नीति नियंता ३० रूपये प्रतिदिन की आमदनी को पर्याप्त समझते हैं, वो भी तब जब ३० रुपये किलो घास भी नहीं मिलती. मेरा सुझाव इन्हें हैं कि ये इसे ३० रूपये की बजाय १० करोड़ जिम्बाब्वे डॉलर कर दें ताकि लोग नोट खा खा के ही मर जायें और कोई भी शिकायत न कर सके कि उसे पर्याप्त पैसे नहीं मिल रहे, पेय जल की शिकायत गरीब नहीं करता.

खैर कम से कम जो बच्चे घर में राशन की अनुपस्थिति के कारण भूखे बैठे रहते थे उनका एक वक्त का भोजन तो पक्का. घटिया और पोषक तत्त्व विहीन यह भोजन उन्हें कुपोषण से ग्रस्त कर मंद गति से काल के गाल में भेजेगा इसकी फिक्र न तो स्कूल प्रबंधन को होती है और न ही बच्चों के माता-पिता को समझ. सरकारी तंत्र का दावा कि इस योजना के क्रियान्वयन से बच्चों के नामांकन और उनकी स्कूल में उपस्थिति में क्रांतिकारी परिवर्तन आया है; जमीनी हकीकत, फर्जी नामांकन, के सामने दम तोड़ता नजर आता है. उस पर पेंच ये कि जिस दिन अधिकारी, जिसे शायद ही उन बच्चों की स्वयं के बच्चों सी परवाह हो, का दौरा होता है उस दिन स्कूल की सफाई से लेकर अध्यापकों की उपस्थिति तक में अन्य दिनों की तुलना में अविश्वसनीय इजाफा हो जाता है.

 
शिक्षा की बात करना तो बेमानी सा लगता है. एक व्यक्ति द्वारा किया गया सामान्य सर्वे ये बताने के लिए काफी है कि अधिकाँश अध्यापक बच्चों को पढ़ाना तो दूर, स्कूल में उपस्थिति तक दर्ज करने नहीं पहुंचते. शेष घर में समय न बिता पाने, व्यक्तिगत काम न होने, पिछले दिनों की नदारदगी को उपस्थिति में परिवर्तित करने या दरबार लगाने के उद्देश्य से स्कूल के दर्शन करते हैं. शिक्षा मित्र रूपी परंपरा ने मूल अध्यापक और शिक्षा मित्र के बीच स्वामी और दास जैसी परंपरा को पुख्ता किया है, और अध्यापन का सारा भार उन शिक्षा मित्रों के सर फूटता है जिनके परिवार गाँवों में प्रतिष्ठा के मूल नहीं हैं. स्कूल में खेलकूद की सुविधाओं का तो अकाल रहता है परन्तु बच्चों का अधिकाँश समय खेलकूद और मध्यान्ह भोजन के इन्तजार में जाता है. शिक्षा के स्तर की प्रतिष्ठा के लिए एक उदाहरण पर्याप्त है. ताजा नियुक्त बी एड डिग्री धारी अध्यापक, जिसने परास्नातक की डिग्री भी संभवतः ले रखी हो, से अगर पूछा जाता है कि पेड़ से टूटा हुआ सेब जमीन पर क्यों गिरता है तो पलक झपकते ही उत्तर मिलता है "न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत से". ऊपर की ओर फेंकी गयी गेंद जमीन पर क्यूँ आ गिरती है के सामने बगलें झांकता नजर आता है. ये अध्यापक पहाड़े रटवाने और विकृत भाषा सिखाने के अलावा और क्या कर सकता है भगवान जाने. उस पर तुर्रा ये कि उन्हें शिकायत है कि उनकी योग्यता के अनुरूप पद की प्राप्ति नहीं हुई, वो ये अछूत काम करने के लिए नहीं बने के बहाने के साथ अपनी जिम्मेदारियों से अच्युत हो राष्ट्र के भविष्य के साथ शर्मनाक मजाक करते हैं. और अधिकाँश समय अपनी ताजा गृहस्थी सम्हालने और संवारने में बिताते हैं. बूढ़े हो चुके अध्यापक पैर फैलाकर बच्चों में जातीय विष घोलने और अपने से नीचे वालों के कान उमेठने में बहादुरी समझते हैं.  युवा अद्यापिका  सारा  समय साज श्रृंगार के बारे में चिंतित, अन्य स्त्रियों के चरित्र को चिन्हित करती और हर पुरुष में व्यभिचारी  खोजती  बिताती है एवं उम्रदराज भेदों के लेनदेन और स्वेटर बुनने सरीखे घरेलू काम निबटाते हुए. नैतिक शिक्षा जरूर दी जाती है लेकिन व्यवहार में उसका पालन कहीं नहीं दिखता. शेष कमी अभिभावकों की अशिक्षा और उनकी बच्चों के प्रति गैर जिम्मेदारी से पूरी होती है.

रूस में रक्त क्रांति (प्रारंभ १९०५) से भी पूर्व जो अध्यापक बच्चों को किसी भी प्रकार की शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना देते थे उनके लिए साइबेरिया भेजने तक की कठोर सजा दी जाती थी, ऐसे अध्यापक की लोक समाज में  प्रखर आलोचना होती थी और उन्हें घ्रणा की द्रष्टि से देखा जाता था. महाभारत काल में भी शिष्यों की पिटाई पर मृत्यु दंड के प्रावधान का उल्लेख है. लेकिन हमारे यहाँ पहले दिन की सुरुआत समझावन लाल से ही होती है. हर कक्ष में अध्यापक वजह-बेवजह बच्चों के स्वाभिमान की ऐसी तैसी करते मिल जायेंगे. घर परिवार से सम्बंधित झुंझलाहट भी अक्सर यहीं निकलती है. समझ गयी तेल बेचने, बच्चों ने पाठ नहीं याद किया या गुरु जी अनुत्तरित हैं पिटेंगे क्षात्र. हर समस्या का समाधान डंडे से होता है. जो जितना गरीब है उतना ज्यादा पिटेगा. घर में भी हालत विपरीत नहीं होते, बड़े नुकसान करें या बच्चे आफत बच्चों के सर फूटनी है.  बच्चों के आत्म सम्मान (watch Brothers Karamazov) को  मिट्टी में  मिलाने का काम परिजन बड़ी जिम्मेदारी से निभाते हैं. अपने पराये का ज्ञान सर्वप्रथम बच्चों को माँ ही देती है.  

नतीजतन ५वीं गुजरते गुजरते अधिकांश बच्चों का शिक्षा से लगाव मर चुका होता है. आगे बढ़ना भी चाहें तो उनकी नींव में राख और गौरव में भूसा भरा होता है. घर में मूलभूत सुविधाओं का अभाव आगे चलकर धन के प्रति अप्रतिम लगाव और मानवीय असहिष्णुता की पहली सीढ़ी का निर्माण करता है, ये कहना आप को भी यहाँ असमसामयिक लगेगा.

मेरा उद्देश्य अध्यापकों के मुंह पर कालिख पोतना नहीं है..... लेकिन हमारी वर्तमान/आगामी पीढी और भारत के भविष्य का चेहरा झुलसा हुआ है. आशा की किरण सिर्फ और सिर्फ प्राथमिक विद्यालय के अद्यापक के हाथ में है.

Further additions in this post are expected.... Ram                       

Monday, October 24, 2011

अथ शोध यात्रा

जिस राष्ट्र की बाल्यावस्था की मूलभूत शिक्षा में ही ग्रहण लगा हो, शोध क्षात्रों की बात करना बेमानी है। थोडा ठगी करूंगा, इस वादे के साथ कि मूलभूत शिक्षा की बात अवश्य किसी दिन लिखूंगा, आज की बात कह देता हूँ। भारतवर्ष में, कुछ अपवादों को छोड़कर, शोध कार्य करने की योग्यता पूरे १७+(परास्नातक) वर्षों की परंपरागत शिक्षा के उपरान्त ही पूरी होती है। इस बीच अनगिनत छोटी बड़ी राज्य/राष्ट्र स्तरीय प्रतिस्पर्धाओं से गाहे बगाहे होना होता है। उस पर तुर्रा ये कि अभी ये १७ वर्षों के अकल्पनीय समर्पण को हमारे ही नीति नियामक अपर्याप्त और विफल घोषित कर राष्ट्र स्तरीय प्रतिस्पर्धा आयोजित करते है। स्तर की बात करें तो आप समझ लीजिये कि शायद येही एक प्रतियोगिता जिसमे १० पदों के लिए १०००० आवेदन से कम आते होंगे। कारण स्वयं ही खुद को प्रतिष्ठित करेंगेकहना अतिशयोक्ति न होगा कि चपरासी के हर एक पद के लिए वेटिकन सिटी जैसा छोटा मोटा राष्ट्र शत प्रतिशत आवेदन करता है, जैसे कि किसी पोप का पद मिलने वाला हो

राष्ट्र में शिक्षा के स्तर को आंकने के लिए मेरा चार पक्तियों का पिछला पोस्ट पर्याप्त है. ये बताता है कि कम से कम १५ वर्षों की विद्यालय से प्राप्त शिक्षा और अनगिनत वर्षों के स्वयं श्रम का क्या हश्र होता है. इसलिए शोध कार्य प्रारंभ करने के लिए और उसकी गुणवत्ता की जरूरत को ध्यान में रखते हुए प्रतियोगिता एक तुच्छ किन्तु टिकाऊ उपाय है. राष्ट्र के उच्च शोध संस्थान विश्व के स्तर पर कहाँ बैठते हैं के लिए लम्बी बहस चलायी जा सकती है किन्तु उनमे प्रवेश विश्व स्तरीय संस्थाओं में प्रवेश पाने से भी दुरूह विकल्प है इसमें कोई संदेह नहीं. कुल मिलाकर शोध की शुरुआत करने के लिए तैयार होते होते व्यक्ति की औसत आयु कम से कम +१७+(-)=२३-२४ वर्ष बैठती है. तमाम दुरूहताओं को ध्यान में रखा जाए तो ये संख्या बढ़ते देर नहीं लगती. ये वो उम्र है जब कि इंसान से परिवार और समाज के प्रति जिम्मेदारियों और उनकी समझ की आशा की जाती है या जानी चाहिएये वो उम्र भी है जब कि इंसान अपने सक्रिय जीवन का आधा पड़ाव पार कर चुका होता है. यहाँ से प्रारंभ यात्रा कहाँ जानी है ये पता लगते लगते (PhD की उपाधि मिलते मिलते) - वर्ष का समय लगना पुष्ट है, और तब तक चेहरा निश्तेज, चश्मे का नंबर -५, त्वचा की चमक फीकी, सर के आधे बाल नदारद, शेष में से आधे सफ़ेद, और संवेदनशीलता नगण्य हो चुकी होगी, जोश में इसका ख़याल भी नहीं रहताक्युकि हमारे जिस अंधे समाज में ब्रम्हचारी और कथित साधू पूज्यनीय है उसी तरह शिक्षित समाज में वैज्ञानिक सम्माननीय है। और जैसे ही कोई व्यक्ति साधू होने का निर्णय लेता है तो लोग उत्सव मानते हैं, ताकि ये भावी साधू दुबारा सामान्य होने के बारे में सोच भी सके, वैसे ही शोध छात्र की चहुँ ओर प्रशंशा होती है और सारी व्यवस्था होती है कि शोध जीविकोपार्जन का मनपसंद व्यक्तिगत निर्णय होकर बलिदान हो जाए।

होता कुछ यु है कि जो क्षात्र अपने समकक्षों में अव्वल होता है, जिसे सीखने जानने की ललक होती है वो जाता है शोध के लिए और शेष पेशेवर विषय चुनकर शिक्षा और अनावश्यक मानसिक परिश्रम से मुक्ति पाते हैंकुछ ही दिन बीतते है, शोध क्षात्र के पास उसके मित्र का सुबह सुबह फ़ोन आता है कि उसका किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में चयन हो गया है और विभिन्न किस्म के लाभों सहित उसका वेतन लाखों की सीमा छू रहा हैनिवास के लिए सुसज्जित मकान और माता पिता की चिकित्सीय जरूरतों के साथ तमाम तरह की सुविधायें, राष्ट्र की उन्नति का प्रतीक और आज की आवश्यकता, भी शामिल हैंयह मित्र अपने भविष्य की योजनाओं में कुछ वर्षों में एक आलीशान घर बनाना और ऐसी ही कुछ चीजें गिनाता है (चार पहिया वाहन चंद दिनों में उसकी होने वाली धर्मपत्नी लेकर आएगी)। इस ख़ुशी के पल में इत्तेफाकन वो पूछ बैठता है "और तुम्हारा क्या चल रहा है?" थोड़ी देर की ख़ामोशी ही सब कुछ बयां करती प्रतीत होती हैस्वाभाविक प्रश्नों के उत्तर शब्दों में कुछ इस तरह पिरो सकते हैं(कृपया धीरे पढ़े और प्रश्न स्वयं निर्मित करें)। यार, अभी तो कुछ खास नहींलेकिन इस साल शायद एक पेपर जायेगा; फेलोशिप ठीक ठाक है, काम चल जाता है, तुम तो जानते हो मुझे पैसे से ख़ास लगाव नहीं है; हाँ अभी तीन(कुछ गायब) साल और लगेगा उसके बाद पोस्ट डोक्टोरेट के लिए जाना होगा; नहीं, देखता हु अगर बाहर मिल गया तो अच्छा वरना यहीं करूंगा; कुछ चार पांच में हो जायेगा; भाई, वो तो सिविल सर्विस(यकीन नहीं) की तैयारी कर रहा है, ऍम बी करना चाहता था, मेरे पास पैसे नहीं थे फीस के; घर पर मां और छोटी बहन है; तुमको शायद बताया नहीं पिता जी तो पिछले साल ही....; मालूम नहीं कैसे, शायद बीमार थेनहीं घर तो जाना नहीं हो पाता, काम लगा रहता है; मां आई थी पिछले महीने डॉक्टर को दिखाना था; ना यार, अभी तो छोटी बहन की पहले करनी होगी वैसे भी कोई अभी तक मिली नहीं; देखा है लेकिन पैसे बहुत मांग रहे हैं; वो, वो तो गयी।

मित्र प्रगतिशील है इसलिए शोध क्षात्र से सच्ची सहानुभूतिपूर्ण भारी गले से अगले महीने के मुहूर्त में शादी का निमंत्रण दे फ़ोन रख देता हैउसे मालूम है कि चाह कर भी ये ५०० किमी दूर उसकी शादी में शामिल होने नहीं आने वाला। सुबह के सात बज चुके हैं, शोध क्षात्र ऊंघते हुए कंप्यूटर पर "job submit" कर दहेज़ (कु)प्रथा को कोसता हुआ बिस्तर का रुख करता है।

जारी...




Saturday, October 8, 2011

८४ हजार जीरो, वाह रे युवा....

इलाहाबाद : कर्मचारी चयन आयोग द्वारा आयोजित संयुक्त स्नातक स्तर (सीजीएल) की टियर-2 परीक्षा के सही उत्तर 11 अक्टूबर तक जारी होंगे। कर्मचारी चयन आयोग के अध्यक्ष ने यह जानकारी वेबसाइट पर दी है। अभ्यर्थियों द्वारा भरी गई ओएमआर शीट भी एसएससी.एनआइसी.इन पर 11 तक अपलोड कर दी जाएगी। यह परीक्षा 3 व 4 सितंबर को हुई थी। ओएमआर शीट और सही उत्तर के मिलान से अभ्यर्थी अपने प्राप्तांक को जान सकेंगे। यही नहीं इस परीक्षा में जिन 84 हजार अभ्यर्थियों को शून्य अंक मिले थे वे भी अपनी गलती को देख सकेंगे।

Monday, September 26, 2011

रेलम पेल से त्रस्त? केरल से सीखो

कोच्चि। देश की आबादी नियंत्रित करने के लिए क्या यह उपाय सही होगा? केरल में यदि किसी पति ने पत्नी को तीसरे बच्चे के लिए गर्भवती किया, तो उसे जेल की हवा खाना पड़ सकती है! राज्य सरकार इसे लागू करेगी या नहीं, यह बाद में तय होगा, लेकिन केरल महिला संहिता विधेयक 2011 में कुछ ऐसा ही प्रावधान किया गया है। इसे न्यायमूर्ति वीआर कृष्ण अय्यर की अध्यक्षता वाली 12 सदस्यीय कमेटी ने मुख्यमंत्री को सौंपा है।

कमिशन ऑन राइट्स एंड वेलफेयर ऑफ वुमेन एंड चिल्ड्रन के मुताबिक तीसरे बच्चे की संभावना के तहत पिता पर न्यूनतम दस हजार रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा या तीन महीने की साधारण जेल होगी। साथ ही सरकारी सुविधाएं और फायदे अभिभावकों को नहीं दिए जाएंगे। हालांकि बच्चों को किसी प्रकार के अधिकार से वंचित नहीं रखा जाएगा। आयोग ने कहा है कि नया प्रस्ताव बच्चों के बेहतर लालन-पालन के लिए प्रभावी होगा।

आयोग ने 19 साल की उम्र में शादी करने और बीस वर्ष की उम्र में मां बनने वाली महिलाओं को प्रोत्साहन राशि के तौर पर पांच हजार रुपए देने का भी सुझाव दिया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकारी और निजी अस्पतालों में सुरक्षित गर्भपात मुफ्त किया जाना चाहिए।

आयोग ने कहा है कि किसी को भी धर्म या राजनीति की आड़ में 'जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम' में छूट नहीं दी गई है। धर्म, क्षेत्र, जाति या किसी अन्य आधार पर किसी व्यक्ति को ज्यादा बच्चे रखने का अधिकार नहीं है। आयोग का गठन राज्य सरकार द्वारा सात अगस्त 2010 को किया गया था। जिसमें महिलाओं और बच्चों के अधिकार और दायित्व संहिता तैयार करने को कहा गया था।

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थोड़ी समझ परिणाम बड़ा, भारत सरकार के काम की चीज नहीं, वो अभी स्पेक्ट्रम बाँट रही और खेल दिखा रही है। राम को जेल की हवा और रावण को मलाई(जनता का खून) खिला रही है।

Friday, September 23, 2011

तराजू

आज पता नहीं क्यूँ दिल में अजीब सी हलचल हो रही थीकोई सुख दुःख की बात थी, कोई ईर्ष्या या आत्मविभोर करने वाली भी बात थीऐसा कोई काम भी किया था कि भयभीत होतीलेकिन घबराहट थी कि जाने का नाम ही लेती थीहर पल बस एक ही बात सूझती थी, उससे बात करनी चाहिएलेकिन रात काफी बीत चुकी थी और देर शाम ही तो बात हुई थी इसलिए फ़ोन कर उसकी नींद में दखल देना मुनासिब समझासारी रात लम्बे डरावने सपने सी बीती, भोर होते रहा गया तो उंगलियाँ स्वयं ही फ़ोन पर चलने लगींपूरी घंटी चली गयी फ़ोन उठाऐसा बिरले ही होता था, तब जब वो किसी छोटे मोटे काम के लिए फ़ोन से दूर होज्यादा देर इन्तजार कर सकी और दुबारा डायल किया, तीसरी बार, ... दसवीं बार, कुछ १० मिनट बीत गए फ़ोन उठाअब दिल की धड़कन तेज हो चली, अन्दर की हलचल उँगलियों के कम्पन से महसूस हो रही थीकल तक तो उसका स्वास्थ्य ठीक था, रात में बहार जाने का कोई औचित्य था और होता भी तो फ़ोन लेकर तो जाताअँधेरा अभी छंटा था इसलिए उसके घर जाने का विचार भी अन्दर ही कुढ़ता रहाफिर से फ़ोन ..... कुछ एक घंटे से ज्यादा का समय इसी क्रम में बीता, और कुछ करने का विकल्प सूझता थाअचानक फ़ोन उठाया गयाआवाज उसी की थी और सामान्य से कुछ विशेष अंतर था आवाज मेंबस एक आश्चर्य बोधक एहसास था की इतनी देर से मैं उसे फ़ोन कर रही थी जबकि सामान्यतः मैं एक बार ही फ़ोन करती थी, उठे या नहींथोडा सामान्य हुई, अनहोनी के बादल छंटे तो गुफ्तगू पर पहुचीवार्तालाप के दौरान उसने स्वीकार किया कि वो रात किसी और के साथ था, और फ़ोन जान बूझकर कमरे पर छोड़ दिया था ताकि मेरा फ़ोन आने की जानकारी उस तीसरे को होदिल घायल था और मैं खामोशमेरी स्वार्थपरता उसकी स्वतंत्रता में बाधा बने इसलिए उसे भरोसा दिलाया कि उसका हर निर्णय मुझे स्वीकार, और उसकी किसी भी वैचारिक या सामजिक पहल पर निर्विरोध समर्थन हैदिन बीतने लगे और मुझे बताया गया कि उपरोक्त घटना विकल्पों की खोज में उठाया गया एक नादान कदम थी और उसे उसके लिए पछतावा है। उसके जीवन में खुद का महत्व जान गौरान्वित महसूस करने लगी। समय और उसके साथ चलते चलते मुझे ये विश्लेषण करने की सुध भी रही कि उसकी ये नादानी वाकई नासमझ कदम था या उस विकल्प रूपी तराजू के भारी पलड़े पर मैं थीधीरे धीरे ये घटना अनलिखा इतिहास हो गयी और हम दोनों ही वर्तमान को जीने लगे

इतिहास ने खुद को फिर से दोहराया, इस बार मेरा पलड़ा हल्का था.......

Tuesday, August 30, 2011

भ्रष्टाचार, अन्ना, समाज, नेता और राष्ट्र (भाग 2)

भारत का शायद ही कोई नागरिक आज ऐसा होगा जिसे अन्ना, उनके भ्रष्टाचार विरोधी अभियान और इस अभियान के समर्थन में उनके जारी अनशन से वाकिफ हो जो विदेशी भी नावाकिफ होंगे उन्हें असंवेदनशील कहा जा सकता है शायद ही दुनिया का कोई कोना हो जहाँ इस अभियान की आवाज़ पहुच रही हो ये अभियान राष्ट्रीय परिप्रेछ्य में है इसलिए अंतर्राष्ट्रीय बातों को ये सिर्फ ये कहकर ख़त्म करना होगा कि "गांधी के स्वतंत्रता आन्दोलन की तरह, अहिंसक होने के कारण, ये भी एक अनूठा आन्दोलन है राष्ट्र और इससे बाहर के हिंसक और उन्मादी आंदोलनों के लिए एक पाठ भी"

पिछले अंक का समापन मैंने इस बात के साथ किया था कि ऐसे लोकपाल बिल आते रहेंगे, व्यर्थ होंगे और जाते रहेंगे। हमें अपने अन्दर झांकना होगा और समाज को बेहतर मूल्यों से अभिमंत्रित करना होगा वैसे कोई भी नियम क़ानून इसलिए व्यर्थ नहीं होता कि उसमे खामियां हैं, बल्कि इसलिए होता है कि उन खामियों का इस्तेमाल हम रचनात्मक कार्यों के लिए कर हानिकारक कार्यों और स्वार्थ्य पूर्ति के लिए करते हैं और कुछ हद तक इसी का नाम है भ्रष्टाचार। भ्रष्टाचारी मतलब भ्रष्ट है आचरण जिसका। सिर्फ किसी काम के लिए या मूलभूत सुविधाओं/अधिकारों से वंचित कर उसकी पूर्ती के लिए किसी से धन ऐंठने भर को भ्रष्टाचार ठहराना अंधे का हाथी ही है जिस आचरण से समाज के विचारों, विकल्पों और उसके सुगठन पर दूषित असर पड़ता हो, जिस कर्म से कोई समाज दुर्बुद्धि हो कुमार्ग की ओर चल दे, जिस कर्म से राष्ट्र हानि और जीवन शैली का पतन हो, जिस कर्म से समाज का अकारण विघटन होने लगे उसे भी भ्रष्टाचार ही कहा जा सकता है

तयशुदा तिथि के अनुसार अन्ना का अनशन शुरू हुआ, प्रशाशन को जो मूर्खताएं करनी थीं कीं। बंदी बनाने से लेकर सारी शर्तें स्वीकार करने तक सबकुछ अन्ना हजारे के अनुरूप हुआ और कुछ भी सरकार के लिए बेहतर न हो सका। सत्ता पक्ष ने अंतिम सांस तक आन्दोलन को न तो सहजता से स्वीकार किया और न ही उसकी गंभीरता को समझने का प्रयास किया। विपक्षी दलों ने भी विषय की जितनी उपेक्षा की जा सकती थी की। किसी भी जिम्मेदार राजनेता को वो बात समझ न आ सकी जो सामान्य अशिक्षित नागरिक को भी आसानी से समझ आ सकती थी। बड़प्पन(लाचारी) विपक्षी दलों का, कि कुछ निरंकुश क्षेत्रीय दलों को छोड़ कर किसी दल ने अपने विरोधियों से निबटने के कांग्रेसी/सरकारी तरीके को नकारा नहीं तो सहयोग भी नहीं दिया। कुछ दिनों पहले की अन्ना और अहंकारी राजनेताओं के बीच की लड़ाई बढ़कर आमआदमी और सरकार के बीच तक पहुँच गयी। "परिवर्तन प्रकृति का नियम है" को भूलकर "संविधान और संसद की सर्वोच्चता और उसकी रक्षा" जैसी बातों की राजनीति सदा की भांति चलती रही.

संविधान एक समाज को सुचारू रूप से चलने का साधन न होकर जैसे सर्वशक्तिमान ईश्वर के वचन हों। समाज और देशकाल में परिवर्तन होगा तो संविधान में परिवर्तन करना ही पड़ेगा। ६० साल पहले लिखा गया संविधान उस समय के समाज के परिद्रश्य में बनाया गया था, वो उस समय के भविष्य की परिकल्पना थी। आज के परिद्रश्य में हम पर परिपक्व चिंतन की मजबूरी और जिम्मेदारी है, ताकि हम बेहतर कल की परिकल्पना कर सकें। तकनीकी से लेकर मानव व्यवहार तक कोई चीज ६० वर्ष पूर्व, जैसी आज है, परिकल्पित भी न रही होगी।

रही संसद की बात तो इस आन्दोलन ने सिखा दिया है कि जहाँ क्षण भर में चेहरे बदलते हों लोग ५ वर्षों में सिर्फ एक बार, वो भी वैकल्पिक, निर्णय नहीं लेंगे बल्कि समयानुरूप जब आवश्यक होगा और उसे अपने चयनित प्रतिनिधि को अपने वैचारिक सुझाव देने होंगे तो देगा। बल्कि उस निर्णय में संशोधन भी कर सकेगा तो और भी बेहतर होगा। संसद को उस सुझाव को सुनना समझना ही नहीं उस पर नीतिसंगत अमल भी करना होगा।

हम सब जानते हैं कि राजनेताओं की मनमानी न चली, अन्ना के अनशन को वैश्विक समर्थन और सहयोग मिला। अन्ना हजारे, जिन पर ६ महीने पहले सिर्फ बुद्धिजीवी वर्ग विचार व्यक्त किया करता था, लोगो के दिल की धड़कन बन गए। आन्दोलन की लोगो के दिलों पर पैठ के लिए ये उदाहरण ही काफी होगा कि जिस देश में क्रिकेट एक धर्म है उसकी शायद ही इन दिनों कोई चर्चा हुई हो और बहुतों को तो ये भी नहीं मालूम होगा कि भारतीय टीम इंग्लैंड की टीम से ०-४ से टेस्ट मैच हारी है। समाज के हर वर्ग में हलचल थी ये बताना व्यर्थ है। १२ दिन के अनशन ने हर वो विचार बदला जो दकियानूस था और तर्कसंगत न था।

इस सारे घटनाक्रम ने तीन बातें स्पष्ट कर दीं एक "हमारा वर्तमान प्रधानमन्त्री बेहद लाचार, मजबूर और गौरवहीन है।" दूसरा "हमारा कथित भविष्य का प्रधानमंत्री गैरजिम्मेदार, विवेकशून्य और अहंकारी है." तीसरा "प्रधानमंत्री के अधिकाँश सहयोगी निरंकुश, असामाजिक और कथित रूप से भ्रष्टाचार में लिप्त हैं/थे।" एक बात जो मुझे दिखी वो ये कि हमारे समाज के बुद्धिजीवी वर्ग को प्रस्तुत करने के लिए कुछ पत्रकार और कुछ वकील ही हैं, ये परिद्रश्य बदलना होगा.

खैर घूम फिर कर बिल पारित हुआ और संसद ने छोटा ही सही लेकिन सकारात्मक और वर्तमान मांग को ध्यान में रखकर कदम उठाया। संसद की कार्यवाही देखकर कोई भी साधारण मनोविज्ञानी कह सकता था कि, अनुपस्थित लोगो की तो भूलो, उपस्थित माननीय सदस्यों में शायद ही कोई उस बहस में उत्साह से हिस्सा ले रहा हो। बहस तो बहाना था लोग गंभीर बिन्दुओं पर बात न कर शरद यादव के बडबोलेपन और बेकार के भाषण पर तालियाँ पीट और अट्ठाहस लगा रहे थे। सच पूछो तो किसी बिंदु के समर्थन का मतलब बहस की व्यर्थता थी और विरोध का किसी में साहस न था। बेहतर सुझाव तो राहुल गाँधी की भांति सदन से नदारद थे।

अन्ना
और उनकी टीम को इस अभियान में सफलता तो मिली लेकिन जन सैलाब घटते ही टीम के सदस्यों का दमन शुरू हो गयादेश के नागरिक इस बात पे खुश हैं कि अब देश भ्रष्टाचार मुक्त हो जायेगा। कुछ बुद्धिजीवियों का कहना है कि जन लोकपाल बिल जादू की छड़ी नहीं है जो भ्रष्टाचार को मिटा दे। ये बात शायद हर भारतीय जानता है, लेकिन वो ये भी जानता है कि जादू की छड़ी के इन्तजार में हाथ में हाथ रखकर कर बैठे रहना मूर्खता है। पहल तो करनी ही होगी। वैसे भी जादू की छड़ी आने न पाए इसके लिए ही हमारी सभ्यता ने हजारों वर्षों का अविश्वसनीय क्रमगत विकास किया है।

देश के सामान्य समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार को अगले अंक में चिन्हित करेंगे.....

Tuesday, August 2, 2011

मेहमान

दिन भर की चहल पहल से फारिग हो थोडा आराम करने का दिल चाहा तो मेहमान कक्ष में ही ऊंघने लगी। आज घर में एक खास मेहमान आया था, मेरी थकान प्रमुखतः इस मेहमान के इन्तजार में रात भर न सोने के कारण थी, बाकी कुछ काम और कुछ इस ख़ास मेहमान की खातिरदारी। मेहमान की उपस्थिति भी मेरी नींद को रोक न सकी और मैं ढेर हो गयी। झपकी ली ही थी कि दोनों गालो में एक के बाद एक मखमली सा एहसास छू गया। मस्तिष्क थोड़ी देर के लिए सक्रिय हुआ, उस अलबेले ने अमर प्रेम की पहली निशानी सुपुर्द कर दी थी, वो दिल जो खामोस हो मेरी जीवन रेखा को लम्बा कर रहा था अचानक जोरों से छटपटाने लगा। किसी दर्द से बेबस नहीं, उस अनोखे समर्पण के एहसास और उमंग को सम्हाल न पा रहा था, बस। नींद हिरनी की तरह कुलांचे भरती हुई कोसों दूर निकल गयी थी। मैं समझ न पा रही थी की इस एहसान का शुक्रिया कैसे अदा करूँ। आज जैसे लग रहा था जीवन का मकसद पूरा हो गया। आज ऊपर वाले ने वो दे दिया जिसकी स्वप्न में भी कल्पना न की थी। आँखें मूंदे थोड़ी देर लेटी रही, पर रहा न गया, आँख खोली तो पाया की मेहमान की आँखों में अनोखी शरारत और मेरे चेहरे पे जन्नत सा सुकून हमारे अमर प्रेम की दास्ताँ लिखने को कातर हुआ जा रहा है।

थोड़ी देर पहले ही तो हम लोग गंगा किनारे शाम की सैर को निकले थे। वो भी चुप थे और मैं भी खामोश थी। अन्दर से आवाज़ तो निकलती थी लेकिन गले से बोल ना फूटते थे। उनका हाल मुझसे जुदा न था। कितनी सारी बातें, कितने अरमान हिलोरें मार रहे थे लेकिन कुछ भी बाहर तो न आता था। जी करता था हांथो में उसका चेहरा ले आँखों में आँखें डाल इस पावन गंगा में उतर जाऊं। अजीब ख़याल था। किनारे पहुचे तो वो गंगा की ओर और मैं विपरीत दिशा में मुह कर के बैठे थे। प्रकृति की छटा निराली थी ये एहसास तो बहुत देर से हुआ, मुझे तो बस ये ही ख़याल था की उसके हाथ की दूरी मेरे हाथ से २ सेमी से ज्यादा न रही होगी। कितनी मन्नतें मना डालीं एक स्पर्श की चाह में, माथे पर पसीने की बूंदे छलक आयीं लेकिन ये दूरी तय न हो रही थी। अचानक वो मेरी गोद में सर रख उगते हुए चाँद की सराहना करने लगा। मेरा दिल उछल कर गंगा में छलांग लगा बैठा। थोड़ी देर बाद जब उखड़ी सांसें सामान्य हुईं तो मुझ पर एक मीठी ईर्ष्या का लेप चढ़ गया। मैं इतने सपने संजोने लगी जितने आज तक देखे भी न थे। प्राण पुकारते थे जब भी निकलें बस इसी अवस्था में। घंटों बीत गए होंगे, उसके सर का भार जैसे फूल से भी हल्का था। सैर ख़त्म कर घर वापस जाने की बात निकली तो जैसे शरीर में जान ही न रह गयी। मेरी प्राणप्रिय गिलहरी हमेशा की भांति मेरी हर हलचल की गवाह थी लेकिन आज ये पहला मौका था जब मैं अपनी भावनाएं उसके साथ साझा नहीं कर पा रही थी।

राम

Thursday, July 21, 2011

देर

पहली बार अपने माता-पिता को इतना ज्यादा घबडाया हुआ तब देखा था जब उस शाम मैं बदहवास सी अचानक, बिना खबर किये शहर से घर पहुची थीमेरी रक्तहीन सूरत पर गड्ढों से झांकती तेजहीन आँखे देख, काले साए जैसा सन्नाटा घर में पैर पसारने लगा थापूरे परिवार का दिल किसी अनहोनी की आशंका से तड़प कर खून के आंसू बहा रहा थामेरे मुह से शब्द नहीं फूट रहे थे, मुझे खुद विश्वास हो रहा था कि मैं शहर से घर कैसे पहुचीमा को पछाड़े खाते देखा गया तो मैं धीरे से बुदबुदाई "१५ दिन से अन्न ग्रहण नहीं किया, और कोई खास बात नहीं"। कुछ शंकाएं विदा हुईं तो नयी शंकाओं ने घर कर डाला। घर में अजीब सी बेचैनी और डर मुझसे चिल्ला चिल्ला कर पूछ रहा था "आखिर हुआ क्या है?"

खाना त्याग प्राण देने का प्रण होता तो घर ही जाती। थोडा बहुत खाना पेट में गया तो कुछ साहस बंधा, रात में सभी लोगो को इकठ्ठा कर एक ही सांस में कह बैठी, "मुझे गैर जाति के लड़के से असीम प्रेम है, और मैं उसी के साथ शादी करना चाहती हूँअन्यथा आजीवन अविवाहित ही रहना पसंद करुँगीमैं अपना सर्वस्व उसी को न्योछावर करती हूँ।" मैंने दहेज़ प्रथा और समाज की अन्य कुरीतियों के प्रति अपने विचार रखे, जिनका मेरे माता-पिता स्वयं निष्ठां से आजीवन पालन करते आये थे। मुझे याद आता है कि मेरे पिता ने एक बार स्वयं कई महीनो तक मुझसे बात नहीं की थी क्युकी मैंने गाँव की उस लड़की से मुलाकात कर ली थी जिसके भाई ने प्रेम विवाह किया था

अविश्वसनीय तरीके से बुजुर्गों ने रूढ़ियों की मजबूत दीवार को तोड़ने में क्षण भर की देरी कीजीवन भर के अनुभव से उन्होंने जो विश्वास और सिद्धांत निर्मित किये थे, मेरे परिकल्पित सुख के लिए रेत के महल से ढह गए। और उनकी जगह ऊंचे और परिपक्व ख्यालों की स्थापना हुई। रात काफी बीत चुकी थी सो आगे का कार्यक्रम सुबह तक के लिए स्थगित हुआसुबह होते ही लोग, अपनी वार्गिक श्रेष्ठता को ताक पर रख, मेरे रिश्ते की बात करने निकल पड़े

दो घंटे भी बीते होंगे मुझे खबर मिली कि "जो मेरे नाम का हर घडी दम भरता था, जो मेरे बिना जीने को स्वप्न में भी स्वीकार न करता था, जो मेरे समाज से भिन्न ख्यालों का असीम आदर करता था, जो मुझे अपना खुदा कहता था, उसे पाने में मैंने देर कर दी।" पीछे मुड कर देखा तो पाया कि अपने जिन सिद्धांतो को मैं शहर में तिलांजलि दे कर गाँव आई थी वो मेरे पीछे गाँवपहुचे हैं और मेरे परिवार वालों के सिद्धांतों के साथ जख्मी पड़े कराह रहे हैं, और मेरा भविष्य असाध्य रोग से अभिशप्त हो अंतिम सांसें ले रहा है। जिस ईश्वर पर अटूट विश्वास था वो कायरों की माफिक मुझे मेरी ही बदहाली पर आंसू बहाता छोड़ नदारद हो चुका है। जीवन के हर पहलू में तर्क खोजने वाली मैं आज असंगत हो सर्वनाश के चौराहे पर बिल्कुल असहाय सी खडी थी। और मेरा भूत मेरी दुर्दशा पर अट्ठाहास लगा रहा था।

राम