Saturday, November 30, 2019

Gauge Dependent Evolution of Life..

More you care about people,
More you want to enter in their brain,
 

More you try encroaching their freedom,
More you are ignored by them,
 

More you go desperado for them,
More you are repelled by them,
 

More you start pointing their vices,
More they start hating you,
 

Less you become humane,
Less they care about you,
 

Less you make progress in life,
Less they notice you,
 

Less you are valued,
Less you live,


Less you breath,

Less you die. 

Monday, January 19, 2015

राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान

राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान को गति देने के लिए सफाई अभियान के कई चरणो में आमूलचूल परिवर्तन किये गए हैं। आम भारतीयों के कचरे से असीम लगाव के कारण, हाल के दिनों में, सफाई करते नेताओं पर हुए हिंसक हमलों में बढ़ोत्तरी दर्ज की गयी थी। तमाम नेताओं को अपनी कुर्सियां बचाने के लिए या तो अपने साफ़ सुथरे दफ्तर पर ही कूड़ा फेंक कर सफाई वाली तस्वीरें खिंचानी पडी थीं, या जेड सुरक्षा के बीच झाड़ू चलाना पड़ रहा था। आजादी के बाद से भारत के एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र होने के कारण, एवं उच्चतम न्यायालय की शह पर, मैला ढोने वाली जातियों ने अपनी सुविधानुसार जातिनाम अपग्रेड कर लिए थे या अन्य धर्मों का रुख किया था। अतः स्वच्छता अभियान की कुंद होती धार को गति देने के लिए तमाम दबे कुचले विधर्मियों की घर वापसी का एक 'लघु राष्ट्रीय पुनर्मूषको भव अभियान' चलाया गया। किन्तु ये अभियान, मीडिया और नास्तिकों के ईर्ष्यापूर्ण विरोध के कारण डूब गया। इस प्रकार से राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान को अधर में लटका देख भारत सरकार ने विश्व की समस्त 'जर्मफोब' प्रजातियों को हिन्दुस्तान में अपनी रूचि को पूरा करने का अवसर दिया है। इस प्रकार भारत सरकार ने एक तीर से निम्नलिखित तीन शिकार कर कूटनैतिक बलिष्ठता का परिचय दिया है। एक: प्रधानमंत्री जी की महत्वाकांक्षी योजना को विकसित देशों का आर्थिक एवं श्रमिक सहयोग मिलेगा। दूसरा: ऐसे समस्त देश भारत की महान प्राचीन संस्कृति से अभिभूत होंगे एवं जाहिलों को 'विश्वगुरु' स्वीकार करेंगे। तीसरा एवं सबसे महत्वपूर्ण: राष्ट्रवादी हिंदुओं को दर्जन भर बच्चे पैदा करने का पर्याप्त अवकाश मिल सकेगा। इसी क्रम में कल विश्व के सबसे तुच्छ, जर्मफोब देश, जापान, की एक सफाई कर्मियों की टीम देश की राजधानी पहुँच चुकी है। जापानी दूतावास ने प्रेस विज्ञप्ति निकाल कर बताया कि 'ऐसी ही टीमें देश के समस्त पवित्र शहरों की पवित्र गन्दगी हटाने के लिये शीघ्र ही पहुँच जाएंगी'। आज ही शहर में सफाई की वजह से दमा, कालरा, टीबी, पीलिया एवं हृदयघात के चार सौ बीस मामले दर्ज किये गए। वहीं दिल्ली में जापानियों द्वारा की गयी सफाई से क्रुद्ध वाराणसी के विद्वान वर्ग ने कल से आमरण अनशन की घोषणा कर दी है। प्रधानमंत्री के सफाई प्रेम से क्षुब्ध वाराणसी की जनता उनको वोट देकर हाथ मलती नजर आ रही है। जापान को भरोसा है कि भारत जाने वाले सफाई कर्मी भारतीयों से आबादी बढ़ाने की कला जरूर सीख लेंगे।

Saturday, February 22, 2014

दहेज़

इंटरमीडिएट में पढ़ाई करते वक्त हमारे स्कूल में एक मास्टर साहब हुआ करते थे, भिखारीलाल कुशवाहा। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के पूर्व क्षात्र थे सो उत्तर भारतीय ग्रामीण परिवेश (जहां लोग दसवीं, बारहवीं की परीक्षा गणित विषय में प्रवीणता के साथ पास कर लेते हैं किन्तु 1/1 कितना होता है नहीं मालूम होता।) की तुलना में बेहतरीन अध्यापक थे. गणित अपने सर पर बालों की संख्या से ज्यादा वर्षों तक पढ़ा चुके थे. निरंकारी थे, एवं ऐसा ही उनकी अभिव्यक्तियों से भी मालूम पड़ता था. दूसरा निरंकारी पैर छुए तो वो भी वैसा ही करते थे. किन्तु हमारी वैसी क्रिया की प्रतिक्रिया की व्युत्पत्ति शायद तब तक निरंकारी संघ में न हुई थी. यूँ तो "दहेज़ लेना और देना पाप है" हमारी नैतिक शिक्षा के पाठ्यक्रम में दूसरी-तीसरी कक्षा में ही आ गया था, किन्तु हमें इस ज्ञान की सार्थकता हमारे इन्ही "गुरु जी" ने समझायी थी. बच्चे अगर दहेज़ लेने-देने में सक्षम होते तो शायद हमें दहेज़ उन्मूलन सम्बन्धी ज्ञान उस कच्ची उम्र में न झेलना पड़ता। वो दिन भी आया जब हमारे एक सहपाठी मित्र को पूछना ही पड़ गया "सर, आप तो दहेज़ प्रथा का विरोध करते थे, फिर आपने अपने बेटे की शादी में इतना सारा दहेज़ क्यूँ ले लिया?". उनका जवाब था कि लड़की के घर वालों ने अपनी लड़की को दिया है, हमें थोड़े दिया है. दूसरे ऐसे ही तमाम जवाब जानने के लिए हरिशंकर परसाई जी के व्यंग, जैसे "आवारा भीड़ के खतरे", खंगालें……

कुछ 15 वर्षों बाद हमारी बारी आयी और हमने पाया कि जितना संघर्ष जनसंख्या विस्फोट की कगार पर खड़े देश में रोजी रोटी के जुगाड़ के लिए नहीं करना पड़ता उतना अपनी शादी में दहेज़ रूपी लेन-देन रोकने के लिए करना पड़ा. लेने वाले और देने वाले दोनों ही लेन-देन पर आमदा दिखे। हमारी बात सुनने के लिए दोनों ही राजी न थे. हमें यहाँ तक कहना पड़ा कि "आज तक न कोई दहेज़ रूपी सुरसा का मुंह भर पाया है, और न किसी सुरसा का मुंह भरा है.", "अगर आप किसी भी प्रकार का दहेज़ रूपी लेन-देन करते हैं तो इसका सीधा मतलब होगा कि आप मेरे मुंह में जूता मार रहे हैं." आदि. फिर भी, हमें चूतिया (इससे बेहतर शब्द नहीं सूझ रहा) समझने वाले लोग दोनों पक्षों से थे. ये वही लोग हैं, जो कल हमारी शिक्षा एवं समझ का गुणगान करते फिरते थे. सहयोग के नाम पर अनर्गल बड़बोलापन एवं कुंठित विचारों के सिवा शायद ही कुछ मिला। छल, फरेब एवं धूर्तता पूर्ण आडंबर, सिद्धांतों पर भारी पड़ रहे थे. शादी के नाम पे हर मौकापरस्त ने हर सम्भव आर्थिक शोषण किया। ऐसे प्रतीत होता था जैसे हमारे हाथ पारस पत्थर लग गयी हो और हम दुनिया की गरीबी ख़त्म करने अवतरित हुए हैँ. ऐसी परिस्थितियों में शोध क्षात्र जैसे दोयम दर्जे का प्राणी होते हुए भी हमने मित्रों से ऋण लेकर दहेज़ विहीन शादी करने का दुस्साहस कर श्रेष्ठ भारतीय समाज के सम्मुख अपनी मूर्खता का ही परिचय दिया.   



हम उन समस्त प्रियजनों का अभिनन्दन करते हैं जिन्होंने इस अनुष्ठान को सम्पादित किया एवं उत्साह पूर्वक अंशभागी हुए

Tuesday, September 24, 2013

जागो मोहन प्यारे

दूर किसी ग्रह में कनखजूरों का एक संसार था। यूँ तो कनखजूरों के बच्चे कनखजूरों जैसे ही दिखते थे किन्तु पूर्व में ग्रह की भौगोलिक विसंगतियों के कारण भिन्न आवासों में रहने वाले कनखजूरों में सूक्ष्म शारीरिक, भाषाई एवं परंपरागत असमानताएं थीं। कुछ कनखजूरे बातचीत के लिए आगे के २० पैरों का इस्तेमाल करते थे, कुछ पीछे के और कुछ बीच के ... आदि। कुछ कनखजूरों का भगवान ऊपर की ओर सर करके चलता था और कुछ का नीचे और कोई भगवान् तो एक ओर के पैरों से चल लेता था .... आदि। सभ्यता बड़ी विकसित और उत्कृष्ट किस्म की थी। ग्रह छोटा होने और कनखजूरों की पैदावार ज्यादा होने के कारण सब मिश्रित हो गया था।

एक दिन किसी कुंठित कनखजूरे ने जहरीले डंक के बल पर एक कनखजूरी का शारीरिक शोषण किया। दर्शक और दार्शनिक कनखजूरों ने दोनों के वंश का विश्लेषण किया एवं उनमे गहरी एवं नई असमानता को चिन्हित किया। तत्पश्चात दो नए कनखजूरा भगवानों का आविष्कार एवं उनका आवाहन किया गया। दोनों भगवानों ने अपने अपने उपासक कनखजूरों को दूसरे भगवान् के उपासक कनखजूरों को नष्ट करने का निर्देश दिया। चंद दिनों पश्चात शेष कनखजूरों ने भी धर्म चक्र प्रवर्तन में हिस्सा लिया एवं अपने हिस्से में आये कनखजूरों का उद्धार एवं कनखजूरियों का भोग किया।

आज ये युद्ध धर्म युद्ध हो गया है, और धर्म युद्ध में किसी एक पक्ष में जाना ही पड़ता है। आप किस पक्ष में हैं ?

Sunday, September 8, 2013

पानी-२

भीषण गर्मी से झुलसता उत्तर भारतीय शहर, पिछली असंख्य दोपहरियों से जुदा, आज गहरा मौनव्रत धारण किये हुए है। इक्का-दुक्का राहगीरों के गालों पर लू के चमाटों की आवाज के अलावा ध्वनि का और कोई स्रोत समझ नहीं आता। फिर भी ये खामोशी शांति की बजाय सन्नाटा ज्यादा लगती है। पिछले छः महीनों से गरीब-अमीर, सधर्मी-विधर्मी, जाति-विजाति के दिलों को संगीनें जोड़ रही हैं। सड़क के पल्लुओं पर जरदोज नालियों में बहते रक्त में पानी की मिलावट की गयी है। सफाई कर्मी ने नालियों के बगल में ही कचरे के ढेर (प्रमुखतः कंप्यूटर, मोबाइल आदि) बनाये थे जो पुनः माओचा रंग में रंगने को मचले जाते हैं। सारा शहर दूर से देखने पर बाजार ही दिखता है किन्तु खरीदारों-विक्रेताओं का टोटा है। टायरों के जलने की सतत दुर्गन्ध, साँस लेने की प्रक्रिया को बाधित करती है।

गली के एकदम कोने पर बड़े से बंगलानुमा मकान और अन्दर की सम्पन्नता से वहाँ के अन्तःवासियों के स्वास्थ्य का बिलकुल भी अंदाजा नहीं लगता। शयनकक्षनुमा एक कमरे के बीचोबीच बिछे पलंग पर कुछ ५-६ वर्ष का बच्चा मरणासन्न अवस्था में लेटा हुआ पास बैठी मरणासन्न माँ से पानी की गुहार लगा रहा है। माँ बार-२ उसे पिता के जल्द ही पानी लेकर आने का ढाढ़स बंधा देती है। ये सिलसिला पिछली दोपहर से चल रहा है। हर चंद मिनटों में माँ दरवाजे का चक्कर काट आती है। इसी क्रम में कुछ घंटे और बीतते हैं। शाम होते होते इस बार गली के दूसरे कोने पर कई जाने पहचाने लोग इसी मकान की ओर बढ़ते और कुछ लाते हुए नजर आते हैं। माँ बदहवास सी भागी जाती है और उस छोटी सी भीड़ में समा जाती है। उस कोने में उठने वाला शोर इस कोने तक स्पष्ट होने लगता है। कुछ ही समय पश्चात वो माँ फिर स्फुटित हो घर की ओर भागती है। बिस्तर पर बेटे को न पाकर आवाज देते हुए पूरे घर में खोजती है। पूजा के कमरे में बेटे को खड़ा देख पल भर के लिए सुकून महसूस करती है पर अचानक गंगा जल की बोतल को खाली, फर्श पर पड़ा देख, ढेर हो जाती है।

Friday, August 9, 2013

समाज, विज्ञान और धर्म (तीन वरदान, तीन अभिशाप )

पृथ्वी की उत्पत्ति, प्रचलित अनगिनत सिद्धांतों में श्रेष्ठतम सिद्धांतों की गणनानुसार, कुछ 4.54 अरब वर्ष आंकी जाती है। मनुष्य के उद्भव की आयु, लगभग बीस से पचास लाख वर्ष, पृथ्वी की आयु की तुलना में नगण्य समझी जा सकती है। यूँ तो हमारा सौर परिवार भी ब्रम्हांड की तुलना में नवजात ही है, किन्तु हमारी चर्चा का विषय मानवोत्क्रान्ति की कथा है; अतः विचार विमर्श की दिशा उत्तरोत्तर होगी। इन बीस लाख वर्षों में से मानव की व्यवहारगत आधुनिकता का काल पचास हजार वर्ष से भी कम है। दैनिक गतिविधियों के लिए अपरिहार्य आधुनिकता के प्रमाण 10 हजार वर्षों से पुराने नहीं मिल सके।

साधारण समझ ये जानने के लिए पर्याप्त है कि इस क्रमगत विकास के प्रथम सूत्र, पुनरोत्पादन, के लिए समाज का निष्पादन अभीष्ट है। समाज से मेरा अभिप्राय एक ही प्रजाति के जीवों के उस समूह से है, जो आपसी मेल जोल और सद्भाव से जीवन-संरक्षण, भरण-पोषण एवं पुनरोत्पादन जैसे मूलभूत कार्यों को संचालित करता है। जीवों के क्रमगत विकास का सिद्धांत समसामयिक श्रेष्ठ और निकृष्ठ सभी सभ्यताओं के लिए कौतूहल का विषय रहा है। किन्तु जो व्याख्या लगभग 150 वर्ष पूर्व चार्ल्स डार्विन ने की, वो आधुनिकता के इस दौर में भी सर्वमान्य है। क्रमगत विकास की उसी निरंतरता में मानव ने आवश्यकता रूपी विचार का पहला बीज बोया। जब आवश्यकता ने उत्तरजीविता को सुद्रढ़ कर व्यवहार में ला दिया, तब तर्क का विकास हुआ, जिसने आगे चल कर ज्ञान और फिर विज्ञान का रूप लिया। तार्किक संगति पर आधारित ज्ञान मानव इतिहास जैसा पुराना नहीं तो बहुत नया भी नहीं है। ज्यामिति जैसे जटिल विषय का ज्ञान पश्चिम को 300 ईसा-पूर्व यूक्लिड के समय से ही था तो पूर्व में समानांतर पाणिनी से लेकर आर्यभट, वराहमिहिर, ब्रम्हगुप्त जैसे अनेक महान गणितज्ञों एवं खगोलविदों ने विभिन्न आयामों में उत्कृष्ट कार्य किया था। आध्यात्म विज्ञान ग्रीस में 600 ईसा-पूर्व थेल्स, सुकरात, प्लेटो एवं अरस्तु जैसे महापुरुषों के कन्धों पर सवार नयी ऊँचाइयाँ छू रहा था तो धर्म के सूत्र पंद्रह सौ ईसा-पूर्व मूसा, जरथुस्त्र के समय में ही अंकित किये जा चुके थे। विकसित समाज के प्रमाण तीन हजार ईसा-पूर्व की बेबीलोन की सभ्यता में चिन्हित किये जा चुके हैं। पूर्व तो धार्मिक और आध्यात्मिक साधना का केंद्र बिंदु रहा है एवं ऋषियों एवं विचारकों की परम्परा किसी काल की मोहताज नहीं रही। सनातन धर्म का उद्भव ज्ञात नहीं, परन्तु वैदिक काल की गणना कुछ तीन हजार ईसा-पूर्व की मान्य है। उपरांत हिन्दू ,जैन, बौद्ध एवं सिख धर्मों ने उत्कृष्टता के आधार पर दुनिया के जन मानस में स्थान पाया।

उपरोक्त उदाहरण ये बताने के लिए प्रस्तुत किये गए थे कि हालांकि आज से 10 हजार वर्ष पूर्व का मानव लगभग अपरिपक्व था, परन्तु 5 हजार वर्ष पूर्व भी समाज, विज्ञान और धर्म अपने उद्गम से परिवर्तन का लम्बा सफ़र तय कर चुके थे। संगठित समाज के प्रमाण उतने ही पुराने समझे जा सकते हैं, जितने कि आग पर नियंत्रण (लगभग 1 लाख वर्ष पूर्व), किन्तु मानव के त्वरित उत्थान की कहानी का आरम्भ पहिये के आविष्कार (15000 - 75000 वर्ष पूर्व) के साथ नहीं होता। गति विकास का पर्याय है किन्तु ये गति लम्बे समय तक जीवन की क्षमताओं तक ही सीमित रही, जबकि ग्रहों की गति की गणनाएं (गलत ही सही) 500 ईस्वी से पूर्व ही आर्यभट को ज्ञात थीं। धर्म की उन्नति का प्रारब्ध देर से हुआ लेकिन अपनी श्रेष्ठतम ऊंचाइयों को इसी ने सर्वप्रथम प्राप्त किया। विज्ञान जब मानव की सीमित क्षमताओं का गुलाम था तभी धर्म के सारे आधुनिक एवं उत्कृष्ट सिद्धांत निष्पादित किये जा चुके थे। धर्म के इस विकास की दो मूल वजहें स्वयं सिद्ध एवं बहुप्रचलित हैं। एक ये कि धर्म का विकास मूलतः व्यक्तिगत प्रयासों से हुआ, जबकि विज्ञान के विकास के लिए सामूहिक एवं संस्थागत प्रयासों की आवश्यकता होती है। दूसरा ये कि समाज में व्याप्त अराजकता को नियंत्रित करने के लिए धर्म से बेहतर उपकरण न तो उस समय उपलब्ध था और न आज उसका कोई प्रतिस्थानिक ज्ञात है।

आज से 400 वर्ष पूर्व तक विज्ञान की समझ चंद ज्ञाताओं तक सीमित और व्यवहारिक मात्र थी। 17वीं शताब्दी में न्यूटन के गति एवं गणना के सिद्धांतो ने विज्ञान को नयी गति दी। वहीं धर्म का उत्थान बुद्ध, महावीर, ईशा, मुहम्मद, जरथुस्त्र, व्यास, कन्फ़्यूशियस, लाओत्से एवं नानक जैसे चंद मानवीय प्रतीकों तक सदियों पहले ही सिमट चुका था। न्यूटन से प्रारंभ होकर विज्ञान का विकास अगले 200 वर्षों में अभूतपूर्व गति से हुआ एवं आधुनिक वैज्ञानिकों की संख्या पूर्व में भारतीय मनीषियों की संख्या से विशाल हो चली।

समाज, मानव प्रजाति का क्रमिक विकास की ओर प्रथम कदम था। वैसे समाज सिर्फ मानव जाति की ही आवश्यकता नहीं है। एक कोशिकीय जीवाणु से से लेकर व्हेल जैसे विशालतम स्तनपायी भी अपने किस्म के समाज में रहते हैं। हिंसक, मांसाहारी जानवरों के समाज बहुधा परिवार तक ही सीमित होते हैं, तो शाकाहारी जीवों के विस्तार की सीमा नहीं होती और अक्सर अंतर्प्रजातीय समूह भी एक साथ निवास करते हैं। समाज की परिकल्पना प्रजातियों से पहले प्रकृति ने ही कर ली थी, तथा इसके प्राथमिक विकास के लिए किसी बौद्धिक दक्षता की आवश्यकता नहीं होती। इंसान ने अपनी बौद्धिक दक्षता से अन्य प्रजातियों की तुलना में बेहतर समाज की परिकल्पना की। आपसी सहयोग, उत्साहवर्धन, सामूहिक प्रयत्न के आधार पर इंसान न सिर्फ एक विकसित समाज का निर्माण करने, बल्कि एक सबसे सुरक्षित वातावरण तैयार करने में सफल रहा। एक सुगठित एवं जिज्ञासु समाज के बिना न तो विज्ञान का विकास संभव होता और न ही धर्म का। शिक्षा, संस्कृति, कला, साहित्य, योग, कृषि, भाषा, संविधान का विस्तार समाज के सतत प्रयास का ही परिणाम है। आज गहनतम और गूढ़तम भावों एवं अभिव्यक्ति को समझने और व्याख्या करने की क्षमता मनुष्य के पास है।

औद्योगिक क्रांति के प्रारंभ में साईकिल के आविष्कार से चलकर आज हमारे कृत्रिम उपग्रह अंतरग्रहीय दूरियों को बौना कर रहे हैं। सतही नजरिये से देखने पर विज्ञान का एक मात्र उद्देश्य 'गति' नजर आता है। किलोमीटर प्रति घंटे की सामान्य रफ़्तार से चलता मानव आज किलोमीटर प्रति सेकंड से चलते प्रक्षेपण यानों की सवारी कर रहा है। दूरियों के मानक समय के मानकों से एकीकृत हो रहे हैं, यथा नयी दिल्ली से न्यूयार्क की दूरी किलोमीटर की बजाय घंटों में ज्यादा लोग समझते हैं। फोन के आविष्कार के साथ संदेशों के पहुँचने का समय लगभग शून्य हो गया। मौसम की जानकारी से लेकर भूकंप और सुनामी आने तक की भविष्यवाणी की जाती है। पिछले 60 वर्षों के वैज्ञानिक इतिहास की कहानी, कंप्यूटर, आज हर दूसरे व्यक्ति के हाथ में है। इसकी सहायता से संख्याओं के जितने आंकलन कल एक व्यक्ति आजीवन करता उतने आंकलन सेकंड से भी कम समय में किये जा सकते हैं, वो भी बिना किसी त्रुटि के; दुनिया की छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी जानकारी आपकी उँगलियों पर नाचती है। गणनाएं इतनी अचूक हैं कि भू-स्थैतिक उपग्रहों की सहायता से हवाई जहाज़ों का संचालन जैसे जटिल कार्य तक बड़ी सुगमता से किये जा सकते हैं। विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में उपलब्ध समस्त लेख आज आप की उंगली से भी छोटे आकार की पेन-ड्राइव में आ जाते हैं। प्रयोगशालाओं में सेकंड के 1 खरब-लाखवें हिस्से की माप, मीटर के 10 अरब-लाखवें हिस्से की, किलोग्राम के 1 खरब-खरब-करोड़वें हिस्से की माप बहुत पहले ही की जा चुकी है। 830 मीटर ऊंची इमारत 'बुर्ज खलीफा' विज्ञान की बुलंदी को ही चुनौती देती प्रतीत होती है। आज हमें ब्रम्हांड में उपस्थित मूलभूत कणों का ज्ञान है, उसका आकार ज्ञात है एवं उसकी उत्पत्ति के तथ्य से हम दूर नहीं हैं। इतना ही नहीं आज चिकित्सा विज्ञान की उन्नति के इस दौर में कोई अगर ये दावा कर दे कि उसने अमृत की खोज कर ली है तो बहुत कम लोग हैं, जो चकित होंगे। कल जिन बीमारियों के कारण देश के देश काल कवलित हो जाते थे, आज वो विलुप्तप्राय श्रेणियों में हैं। जिन बीमारियों की कल्पना भी न होती थी उनका इलाज भी खोजा जा चुका है। यहाँ तक कि आज कृत्रिम ह्रदय तक लगाया जा सकता है। शरीर का ऐसा कोई अंग नहीं है जो प्रतिस्थापित न किया जा सके। "हम क्यूँ हंसते हैं? क्यूँ रोते हैं? क्यूँ दुखी होते हैं? क्यूँ प्रसन्न होते हैं?" इन सभी सवालों के जवाब हमारे पास हैं। माता-पिता के स्वास्थ्य सर्वेक्षण से आने वाली संतति और उसकी आने वाली कई पीढ़ियों के स्वास्थ्य का अनुमान लगाया जा सकता है। जीवों के शरीर के हर अंग की प्रत्येक कोशिका की समस्त कार्यविधियों की सटीक जानकारी है। आगे चल कर हम मशीन से ही देखेंगे, सुनेंगे, सूंघेंगे, स्पर्श, विचार एवं महसूस करेंगे। कंप्यूटर या मोबाइल जैसी उन्नत युक्ति को शरीर के अन्दर स्थापित किये जाने की जरूरत महसूस होने लगी है, जिसका संचालन हम बाह्य माध्यमों से न करके मानसिक सन्देश वाहक तरंगों के माध्यम से करेंगे। आज सोने जाने से पहले और जगने के बाद के ऐसे पांच काम भी आप को गिनाना मुश्किल हो जाएगा, जिसमें आप मशीन का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष उपयोग न करते हों। अतः हमेशा से ही आवश्यकता और आविष्कार के बीच एक अटूट सम्बन्ध रहा है और इसीलिये हमारी विज्ञान पर निर्भरता न पहले कम थी न भविष्य में कम होने की संभावना है, बल्कि वो दिन भी आ सकता है जब इंसान मशीनों का शाब्दिक अर्थों में ही नहीं वास्तविक अर्थों में भी गुलाम होगा।

जहाँ तक विज्ञान सतत प्रयास की कहानी कहता है, वहीं धर्म मुख्यतः चंद महापुरुषों का ही कार्यक्षेत्र रहा है। अधिकांशतः जिन विशिष्ट महापुरुषों को किसी धर्म का सबसे बड़ा प्रहरी समझा जाता है उन्होंने किसी धर्म का निर्माण नहीं किया। किन्तु मानव विकास में धर्म का उतना ही योगदान रहा है जितना विज्ञान का, बल्कि धर्म को विज्ञान की सीढी का प्रथम पायदान कहा जा सकता है। एक समय ऐसा भी था जब विज्ञान को धर्म की तुला पर तोला जाता था। धर्म वो पहला माध्यम था, जिसने इंसान को जानवरों से प्रथक कर सभ्यता और बर्बरता के बीच के फर्क को समझाया। वो धर्म ही है जो प्रेम, करुणा और सहिष्णुता की शिक्षा देता है। धर्म और विज्ञान के बीच एक समानता ये भी है कि जिस प्रकार विज्ञान के नियम समस्त संदर्भों में एक सामान व्यवहार करते हैं, उसी प्रकार दुनिया की अलग-अलग सभ्यताओं में विकसित धर्म के विभिन्न प्रारूपों में सन्देश लगभग समान हैं। जीवन का महत्व, संतोष, सदाचार, सत्य, निष्कपटता, चैतन्य, संकल्प, सुवचन, कर्म, प्रयत्न, भक्ति, अविलासिता, ईमानदारी आदि का पालन जैसी शिक्षाएं समाज के लिए आवश्यक नहीं, और विज्ञान के लिए निर्मूल हैं। वो धर्म ही है, जिसने उपरोक्त सन्मार्ग दिखाकर जीव मात्र के उत्थान एवं शांति का मार्ग प्रशस्त किया है। मनुष्य को उसकी कुंठाओं से निकालकर मानसिक रूप से स्वस्थ्य समाज के निर्माण का मार्ग धर्म से होकर ही जाता है। कर्मयोग, भक्तियोग एवं सांख्ययोग जैसे गूढ़ सिद्धांतों का निष्पादन धर्म के ही संरक्षण में हुआ है।

यह बात सच है कि उचित-समाज, धर्म और विज्ञान की संकल्पना से रहित मानव आज उस स्थिति से भिन्न न होता जिस स्थिति में धरा में रहने वाली अन्य प्रजातियाँ हैं। बर्बरता से पूर्ण, भय और संकट के वातावरण में भटकती, जीवन के लिए संघर्ष करती एक और प्रजाति। किन्तु, हमारे क्रमगत विकास को एक भिन्न पहलू से भी देखने की आवश्यकता है। पहला प्रश्न समाज पर: क्या हमारा ये समाज एक आदर्श समाज कहलाने की योग्यता रखता है? आप में से अधिकाँश का उत्तर नकारात्मक ही होगा। कारण बड़े नहीं लेकिन गंभीर हैं। आज समाज में अविश्वास की जडें अकथनीय रूप से गहरी और मजबूत हैं। हर दूसरा आदमी 'दुनिया बड़ी बुरी है' या 'मुझे अपने बाप पर भी भरोसा नहीं' कहता मिल जाएगा। अविश्वास पर विश्वास इतना मजबूत है कि 'बुरा जो देखन मैं चला ..... मुझसे बुरा न कोय' जैसे बलिष्ठ सिद्धांत धूल खाने लगते हैं, और हो भी क्यूँ न ऐसा। झूठ, छल, फरेब, चोरी, छिनैती, हत्या, बेईमानी, शारीरिक-शोषण, भ्रष्टाचार का साम्राज्य चारो और फैला हुआ है। छोटा-बड़ा, राजा-प्रजा, मालिक-मजदूर, नेता-अभिनेता, कृषक-अभियंता, शोषित-शोषक, पीड़ित-उत्पीड़क, रोगी-चिकित्सक हर कोई लूट की गंगा में हाथ धोने को बेताब है। आने वाली पीढी की किसी को परवाह नहीं, और ऐसा कोई आदर्श स्थापित नहीं हो रहा जो प्रशंशनीय हो। बचपन में मिली नैतिक शिक्षा की लाठी माता-पिता और पड़ोसियों के सर फोड़ने के काम आती है। महंगे विद्यालयों में प्रवेश दिलाने मात्र से माता-पिता का बच्चों के प्रति जिम्मेदारियों का वाहन हो जाता है। चरित्र निर्माण तो व्यभिचार की परिभाषा तक ही सीमित रह गया है। जाति-वर्ण-सम्प्रदाय में विघटित समाज इसी विघटन के दलदल में डूबने को उत्कंठित है। बाल-मजदूरी और युवाओं में नशे का रुझान अविकसित और विकासशील देशों की गंभीर समस्या बना हुआ है। पहले से व्याप्त अशिक्षा के बीच शिक्षा के स्तर में गिरावट समाज का एक प्राणान्तक रोग है। जितना अविकसित समाज उतनी बड़ी दुर्बुद्धि का शिकार। भारत देश में ही दहेज़ हत्या, बलात्कार, महिला-भ्रूण-हत्या के हजारों प्रकरण प्रति वर्ष होते हैं। दुनिया की लगभग एक तिहाई महिलाओं की आबादी नैतिक अधिकारों से वंचित, गुलामों जैसा जीवन जीने को मजबूर है। हर 6 में से एक व्यक्ति रोज भूखा सोता है। ऐसा एक भी दिन नहीं होता, जब दुनिया के किसी न किसी कोने में घोषित युद्ध न हो रहा हो। विकसित देशों ने प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के लिए सम्पूर्ण अफ्रीका को काल के गर्त में धकेल दिया। प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न सम्पूर्ण अफ्रीका आज गृह-युद्ध का शिकार है, और अधिकाँश आबादी अंगभंग से अभिशप्त है। अनेक संघर्षशील देश, विकसित देशों के शक्ति एवं आयुध परीक्षण स्थल बन कर नष्ट हो गए। इराक, वियतनाम, अफगानिस्तान, भारत, पाकिस्तान, कोरिया, लीबिया, सीरिया, सियार-लियोन, काँगो, निगार, अंगोला, सोमालिया, इथोपिया आदि एक बड़ी सूची के कुछ नमूने हैं।

सांप्रदायिक सौहार्द, प्रेम, सहिष्णुता, ईमानदारी, सत्य, निष्ठा, सदाचार तो धर्म के सिर्फ मुखौटे से प्रतीत होते हैं। धर्म के नाम पर भोंडे संस्कारों एवं अंधविश्वास को बढ़ावा दिया जाता है। साधारण संदेहों को मिटाने में असमर्थ अशिक्षित और कुत्सित मनोवृत्ति वाले धर्मरक्षक नासमझ-जाहिलों को पूर्व और पराजन्मों का भय दिखा व्यक्तिगत स्वार्थों की पूर्ति करते हैं। मृत्योपरांत क्षुधा-सुख का लालच देकर युवा वर्ग को आतंक का दूत बनाया जाता है। सत्ता सुख के लिए स्वार्थी व्यक्ति धार्मिक उन्माद को बढ़ावा देते हैं एवं सामूहिक उपद्रव तक का अनुष्ठान करते हैं। धार्मिक पुस्तकों की शपथ लेकर शासकों ने गाँव-नगर-देश भी नष्ट किये हैं। मानव इतिहास में धर्म के नाम पर पश्चिम से लेकर पूर्व तक जितना कत्लेआम हुआ है, वो कल्पनातीत है। समस्त धर्मों की शिक्षा समान होते हुए भी 'सर्वधर्म-समभाव' का अहसास कहीं नहीं होता। ईश्वर के नाम पर लोग नीचतम कुकृत्यों को संपन्न करते हैं एवं उसी को ईश्वर प्राप्ति का मार्ग बताते हैं।

विज्ञान ने हमारी विकास की गति को तो बढ़ाया है, किन्तु पिछले पचास वर्षों में पृथ्वी ने जैसा उग्र परिवर्तन देखा है वैसा मानवता ने पिछली समस्त पीढ़ियों में भी नहीं देखा। इतने ही समय में दुनिया की आबादी 3-4 गुना बढ़ गयी है। मशीनों ने मनुष्य का स्थान ले लिया है। जैसे-जैसे मशीनों की दक्षता बढी है, वैसे-वैसे मनुष्य स्वास्थ्य और शारीरिक क्षमता की दृष्टि से मायूस होता गया है। उत्पादन बढ़ने से मानव की उपभोग की नियति में भी बदलाव आया है और प्रति व्यक्ति खपत में पिछले पचास वर्षों में सैकड़ों गुना की वृद्धि हुई है। पिछले 10 वर्षों में हमने नष्ट न हो सकने योग्य उतना कचरा पैदा किया है, जितना उससे पहले के पांच सौ वर्षों में भी नहीं किया था। उससे पूर्व नष्ट न होने योग्य कचरे का प्रादुर्भाव ही नहीं हुआ था। विकास की अंधी दौड़ में मनुष्य ने धरा का असीम दोहन किया है। मानवता का विज्ञान की ओर पहला कदम जंगली जानवरों का शिकार और सुरक्षा के लिए था, जबकि आज विज्ञान ने सुरक्षा के नाम पर विनाश के ऐसे हथियार तैयार कर लिए हैं, जिनके इस्तेमाल से पृथ्वी को अनेकों बार नष्ट किया जा सकता है। 'होम' नामक वृत्तचित्र से लिए गए निम्नलिखित आंकड़े शायद आप तक मेरी बात पहुंचा सकेंगे। " दुनिया जितना अर्थ विकासशील देशों को अनुदान में देती है, उसका 12 गुना सेना के आयुध बनाने में खर्च किया जाता है। दुनिया के पांच सबसे विकसित राष्ट्र 85% आयुध निर्यात करते हैं। पांच हजार लोग प्रतिदिन गन्दा पानी पीने से काल के गाल में समा जाते हैं। एक अरब लोगों को पीने के स्वच्छ पानी की उपलब्धता नहीं है। इतने ही लोग भुखमरी के शिकार हैं। कुल उत्पादन का आधा आनाज मांस या जैव ईंधन उत्पादन में खर्च होता है। चालीस प्रतिशत कृषि योग्य भूमि को गंभीर रूप से क्षति पहुँच चुकी है। एक करोड़ तीस लाख हेक्टेयर भूमि के जंगल प्रति वर्ष नष्ट हो रहे हैं। चार में से एक स्तनपायी, आठ में से एक पक्षी, तीन में से एक उभयचर प्रजातियाँ विलुप्तता की कगार पर खडी हैं। प्राकृतिक दर की तुलना में हजार गुना तीव्रता से प्रजातियाँ ख़त्म हो रही हैं। तीन चौथाई मछली पकड़ने योग्य जगह ख़त्म हो चुकी है। पिछले पंद्रह वर्षों का औसत तापमान उत्तरोत्तर बढ़ा है एवं पृथ्वी की बर्फ की चादर चालीस वर्ष पहले से चालीस प्रतिशत पतली हो गयी है। शरणार्थी शिविर दुनिया के सबसे बड़े शहरों में तब्दील हो रहे हैं।"
'इस्तेमाल करें और फेंक दें' की नीति ने सम्पूर्ण धरा को स्थायी कूड़ादान बना दिया है। विकासशील देशों के तमाम छोटे बड़े शहर मिट्टी की बजाय प्लास्टिक पर निर्मित प्रतीत होते हैं। 'जॉर्डन' जैसी तमाम नदियाँ जिनके नाम पर देशों के नाम हुआ करते थे, वे अब और समुद्र तक नहीं पहुंच पातीं। गंगा जैसी पवित्र और आस्था का केंद्र समझी जाने वाली नदियाँ मल और जहरीले औद्योगिक रसायन अपवाहन का माध्यम रह गयी हैं। पानी की ही भांति, वायु प्रदूषण ने भी 'सदाचारेन पुरुषः शतवर्षानि जीवति' को अंगूठा दिखाया है। प्रतिदिन विभिन्न किस्म के नए और असाध्य रोग जन्म ले रहे हैं। खाद्य और पेय वस्तुओं में जहरीले कीटनाशकों की बढ़ती मात्रा मानवता को सामूहिक अपंगता की ओर धकेल रही है। हमारी ऐसी कोई दैनिक गतिविधि नहीं रही जिसमें कैंसर या हृदयघात का खतरा न हो। सन 2008 में ही 1.27 करोड़ कैंसर के नए और 76 लाख कैंसर से मृत्यु के मामले सामने आये हैं। हृदयघात से मृत्यु के इसी वर्ष में 1.73 करोड़ मामले, कुल मृत्यु का एक तिहाई हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार आज तक युद्ध में मारे गए लोगों की संख्या पृथ्वी की वर्तमान आबादी के आधे से भी अधिक है। ये सब आंकड़े अल्पविकसित देशों के अनुपलब्ध आंकड़ों से इतर हैं। इसी गति से उन्नत होता विज्ञान जल्द ही विनाश की कहानी लिखेगा, इसमें दोराय नहीं।

आशा करता हूँ कि मानवता अपनी शत-वर्षीय दीर्घनिद्रा का जल्द ही परित्याग कर देगी। अपने सुझावों को किसी और अंक के लिए सुरक्षित रख मैं अपनी कलम को विराम देना चाहूंगा।

राम लाल अवस्थी


अधिकाँश आंकड़े विकीपीडिया, 'होम' वृत्तचित्र, या सम्बंधित शोध पत्रों से लिए गए हैं।
कुछ आंकलन पूर्व के अध्ययन एवं स्मृति पर भी आधारित हैं।

यह लेख एक साप्ताहिक पत्रिका के प्रथम संस्करण में प्रकाशित होना था। सरकारी दुरूहताओं के कारण प्रकाशन अभी तक संभव नहीं हो सका इसलिए ……     

Friday, June 28, 2013

ईश्वर एक खोज

जब भाषा और संस्कृति अपने शैशव काल में थी और इंसान ने उत्तरजीविता का सिद्धांत बस सीखा ही था। संस्कारों में अपने से बड़ों का आदर करना सीखा-सिखाया जाने लगा था। रात्रि प्रहर नवयुवा (कर्म) अपनी तमाम गतिविधियों एवं अनुभवों को अपने बुजुर्गों (ज्ञान) से साझा करते थे और जानने की कोशिश करते थे की क्या उनका विकास सही दिशा में हो रहा है। परिवर्तन और उन्नति के क्रम में कर्म के स्थान पर ज्ञान का विकास ज्यादा हुआ। कारण स्वाभाविक था : कर्म ऊर्जा और ज्ञान अनुभव के आधीन था। अनुभव को श्रेष्ठता के श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत करते समय अपने पूर्वानुभव को सुनाने की अनायास 'जरूरत' महसूस होने लगी जो उत्तरोत्तर 'आदत' में परिवर्तित होने लगी। इसी क्रम में किसी कुंठित एवं अनुभवशून्य ज्ञान ने उपलब्ध बोध और तार्किक अपारगाम्यता के आधार पर एक ऐसे काल्पनिक श्रेष्ठतम मनुष्य का उदाहरण रच डाला  जो कार्मिक पहुँच से दूर था। कुछ उत्सुक और जिज्ञासु कर्मों ने श्रेष्ठा के उन मानकों को भी दुस्साध्य न रहने दिया। परिणाम स्वरुप श्रेष्ठता के मानक सामान्य से असामान्य और फिर बेहूदे होने लगे। असीम समयोपरांत जब बेहूदगी समस्त सीमाएं पार कर चुकी थी एवं कर्म और ज्ञान के बीच की खाई अभूत्पूर्वक रूप से बढ़ चुकी थी, कर्म ने ज्ञान से ऐसी उत्कृष्टता के नमूने की मांग कर दी, जिसके अभाव में कुछ और नए मानक रचे गए। इन समस्त मानकों के तत्त्व से बनी परिभाषा से पूर्ण उस परिकल्पित श्रेष्ठ मनुष्य को ईश्वर कहा गया। कर्म की पहुँच से दूर अपरिमेय ईश्वर। पुनः जिज्ञासु कर्म ने इस अपरिमेयता के सिद्धांत को अस्वीकार कर दिया और ज्ञान से सशंकित पूछा कि आप उसके बारे में इतना जानते हो मिले होगे या देखा होगा या सुना होगा, ऐसा क्या  किया जाए ताकि हमें भी ऐसे चमत्कार से संपर्क करने एवं स्वयं की उन्नति का अवसर मिले। ज्ञान भी कभी कर्म था और उसे मालूम था कि कर्म से ये संभव नहीं और अगर ऐसे किसी कर्म, जो असंभव हो, की परिकल्पना दुर्लभ होने के कारण कुछ नए कर्म प्रादुर्भाव में आये जिसे 'धर्म' कहा गया। कर्म से कर्म के बीच खाई बनी। एक ने ईश्वर को अस्वीकार कर दिया एवं धर्म को 'कर्मकांड' कहा और नर्क का बीज बोया। दूसरे ने राम का आविष्कार किया और नर्क की फसल काटी।

Thursday, May 9, 2013

देख तेरे भगवान् की हालत क्या हो गयी इंसान .....

मैं भगवान हूँ। सही पहचाना। पोशाक से ही नहीं लगता, वास्तव में भी मैं खुदा हूँ। आज कल आँख से कम दिखाई देता है इसलिए -५ नंबर का चश्मा लगाता हूँ। क्या करूं, रोज नहाता हूँ और रोज कपडे भी धोता हूँ किन्तु दो पल के लिए भी लोग साफ़ सुथरा नहीं रहने देते। तुम्हारा नाम ही रामलाल है न? देखो मेरी कॉलर पे तुम्हारी उसी बेटी का खून है जिसका तुम थोड़ी ही देर पहले बलात्कार करके आये हो। तुम्हें बदबू आती होगी; मुझे नहीं, मेरी तो आदत पड़ चुकी है। तुम नहीं समझोगे, असल में जैसे मैं तुम्हारा भगवान् हूँ वैसे ही मेरा भी एक भगवान् है। जब मैंने इंसान बनाया था तो मुझ पर नाराज हो उसने मुझे शाप दिया था कि 'जो भी गन्दगी इंसान फैलाएगा उसे मुझे अपनी जीभ से साफ़ करना होगा' अतः मैं किसी का खून पी कर नहीं आया, तुम्हारे पीछे-२ अभी तुम्हारे घर से ही आ रहा हूँ। क्या बकवास करते हो? कोई बलि-वलि नहीं लेता था मैं। जैसा मैंने बताया, एक दिन बूचड़ खाने की गन्दगी साफ़ करते तुम्हारे पूर्वजों ने देख लिया था तभी से मुझे खून पे खून पिलाए जा रहे हैं। पहले जानवरों का ही पिलाते थे फिर इंसानों का भी पिलाने लगे, तुमको पता नहीं इस खून की उल्टियां कर कर के मैंने स्वर्ग की तमाम जगह यहीं जैसी कर दी है। नहीं -२ मेरा परमानेंट रेसिडेंस तो ऊपर का ही है  किन्तु आज कल वहाँ कम ही जाना होता है। अरे वो, मैं तो ट्रेन का इन्तजार कर रहा था एअरपोर्ट जाना है। नहीं -२ वहाँ कोई बात नहीं हुई, मुझे दमिश्क की फ्लाईट पकड़नी है। वहां की पिछले एक हफ्ते की गन्दगी साफ़ करनी है। अपना वाहन तो है किन्तु आज कल जॉब नहीं कर पा रहा तो कुछ आमदनी नहीं हो रही इसलिए उसका खर्चा नहीं झेल सकता। हाँ, सो तो है किन्तु मुझे भारत-पाकिस्तान का बंटवारा आज भी याद है जब महीनों तक मैं सो भी नहीं पाया था। इतना जहर था लोगों के खून में कि जीभ में छाले पड़ गए थे। और ये कमर तब झुकी कि आज तक सीधी न हो सकी। फिर का मतलब क्या है? आना ही पड़ेगा, सालो तुम लोग इतना बलात्कार ही करते हो। हाँ बे, वहाँ तो लोग मर रहे हैं न .... यहाँ ??? मेरा मुंह मत खुलवाओ, जिस शरीर के साथ तुम खिलवाड़ करते हो न, उसे मेरी माँ  ग्रहण कर लेती है। महाराष्ट्र तो जा ही रहे हो न वहाँ कुछ गुल खिलाओगे तो सेवा में उपस्थित होना ही पड़ेगा। नहीं कुछ ख़ास नहीं, बस १० दिन बाद वहाँ प्यास से मरते लोगो की लाशें फूंकनी हैं।

Wednesday, February 13, 2013

गति

इस बार किस्मत से सर्दियों में अवकाश मिल जाने के कारण सोचा शादी की तैयारियां कर डालते हैं, बस तीन महीने ही तो बचे हैं, उम्र भी हो रही है और अब नौकरी की भी फ़िक्र नहीं। गाँव पंहुचा तो एक अलग ही किस्म की गर्मी थी उधर, हर कोई घर पर खाने पे बुला रहा था, सब जगह इज्जत मिल रही थी, लोग तमाम मुद्दों पर मेरी सलाह ले रहे थे, इन सबसे अलग हमारी दादी की रगों में खून की जगह बहता गर्म लावा समझ से परे था। एक सप्ताह बीतते बीतते सब सामान्य हो गया, दादी की प्रसन्नता छोड़। एक दिन जब छत पर बैठे दादी के दुलार का रस पान कर रहा था तो पास बैठी स्वेटर बुनती माँ ने धीरे से कहा, अम्मा चाहती हैं उनको कुम्भ स्नान करा लाओ। नजर दादी के चेहरे पर गयी तो उनकी अधीर आँखों ने कहा 'मेरा बेटा, हमारी तुमसे पहली और अंतिम इक्षा बस इतनी ही है। हमको गंगा स्नान करा लाओ तो हम चैन से मरें।' मेरा दिल उस बेचारगी पर सिहर उठा, और शायद घर में उस समय मैं ही था जो उनकी इस इक्षा को पूरी कर सकता था। यूं  तो मुझे गंगा की दुर्गति पर व्यथा और धर्म के व्यापार पर असीम अनिष्ठ थी पर दादी का उत्साह मेरी घृष्टता पर विजय प्राप्त कर चुका था। मौनी अमावस्या का स्नान पक्का हुआ, रेल में आरक्षण नहीं मिल सका और बस का आवागमन उनके स्वास्थ्य के लिए ठीक न समझ दुर्गति पूर्ण साधारण डिब्बे की मारामारी पूर्ण यात्रा पूरी की। इलाहाबाद से शिक्षा लेने के कारण तमाम प्रशाशनिक बाधाओं के बावजूद संगम पहुँच गए एवं  करोड़ो श्रृद्धालुओं के साथ स्नान हुआ। पहली बार किसी बुजुर्ग की इक्षा पूरी करने पर संगम स्नान से ज्यादा पुण्य मिलता प्रतीत हुआ।

रेलवे स्टेशन पर मची भगदड़ के हम प्रत्यक्ष दर्शी थे। लोग बावले हो गए थे और प्रशाशन शैतान। थोड़ी देर बाद सब शांत था। मेरी दादी को मैं दीवार के पास ले गया था अतः कुछ चोटों के अलावा उनको खास क्षति न पहुची थी, पर वो सहमी बहुत थीं। भगदड़ के केंन्द्र बिंदु ओवर-ब्रिज एवं उसके आस पास की  जगह को खाली करा लिया गया था एवं किसी को उस जगह जाने की अनुमति न थी, किन्तु मैं उन सीढ़ियों के बीचो बीच बैठा था। चंद पुलिस वाले घायलों और लाशों को उठा रहे थे। उनमे से एक मेरी भी थी....... 

Wednesday, December 19, 2012

My Fundamental Rights

Being an Indian, a pure Aryan Blood, I posses the fundamental rights listed below 

1) To acid attack a women for not copulating with me.
2) To kill a women for not getting enough dowry from her father.
3) To force women for female foeticide and kill her before she is born.
4) To coerce women for prostitution.
5) To rape and ravage her to cool the fire of lust.
6) To kill her any time for whatsoever reason. 

I religiously practice these rights and this way I entrust myself in the service to my Great nation and upraise MY DIVINE CULTURE AND ORDER OF MY GOD TO ME.     

Thursday, September 13, 2012

पशु मानव

राजस्थान के सीकर जिले में एक स्थानीय अदालत ने भैंस के साथ यौनाचार करने के आरोप में एक व्यक्ति को पांच साल की सज़ा दी है (बीबीसी हिंदी में प्रकाशित एक खबर का पहला वाक्य).

सरसरी नजर में तो ध्यान ही नहीं गया। यौनाचार, कैद, आदि सब ठीक ही था। लेकिन बेशर्म नजर अचानक भैंस पर चली गयी। अचानक ठहर जाना पड़ा। अंध-धार्मिक होता तो भैंस या अभियुक्त या दोनों के लिए ऊपर वाले से दुआ या अभिशाप की आश लगाता। आज कल की युवा पीढी एवं कुंठित वृद्धों के जिगर, फेसबुक, से हाल कहने का विचार भी आया, किन्तु लगा ये कुछ ज्यादा ही हो जाएगा, कितने लोग हजम कर पायेंगे, लोग क्या सोचेंगे क्या सोचता है, यही करता रहता है क्या, दकियानूसी विचार क्यों आ रहे हैं, मैं भी सोच सकता हूँ, मेरी क्या गलती अगर लोगो की लग जाती है, शेयर करने से क्या होगा, आज कल तो "असीम त्रिवेदी जी" पॉपुलर हैं सोशल मीडिया पर, जस्टिस तो हो चुका अब और क्या करना है, मैं कौन होता हूँ इस बकवास में पड़ने वाला, "भैंस के आगे बीन बजाते सुना था", ये सब करने की क्या जरूरत थी बन्दे को? क्या वाकई जरूरत नहीं थी, मजबूरी रही हो सकती है, पिस्तौल सर पे रही हो सकती है, शर्मीला था?? नहीं-नहीं ऐसे कैसे कह सकते हैं, मनोरोगी हो सकता है, लेकिन मनोरोगी भी प्रजाति तो पहचानता होगा, दीवाल, पेड़, तकिया... क्या?? वाकई!! सांप भी मर गया लाठी भी न टूटी, इतना स्मार्ट??.......... ये हो क्या रहा है मुझे, साला(अपरिप्रक्ष्य)?

बहुत देर तक जीवन सामान्य रहता है। फिर अनजाने में वो विचार लहराया, 'कुछ २०० वर्ष पहले यूरोप के बुद्धिजीवी वर्ग में "क्या महिलाएं भी इंसान हैं?" को गंभीर चिंतन का विषय माना जाता था, बिना परवाह के कि उस समय भी कई महिलाएं स्वतंत्र, आत्मनिर्भर, विवेकशील, संभ्रांत या आलीशान जीवन जीती थीं'. और न चाहते हुए भी मेरे सर पे फिर बीन बजने लगा और मैं पागुर करने लगा। मुझे नहीं मालूम ये दफा ३७७ क्या होती है। लेकिन एक बात समझ ना आयी। भैंस का शोषण हुआ है सजा तो मिलनी ही चाहिए। उसी भैंस का दोहन करना, बंधक बना के रखना और जीभ की हवस मिटाने के लिए क़त्ल करना शोषण की श्रेणी में क्यों नहीं आता? अगर आता है तो फिर इस पर कौन सी दफा लागू होती है? अगर कोई सी लागू होती है तो जिसने जिसने भैंस का दूध पिया है या मटन मारा है, उसके लिए क्या उपहार है? भैंस-माता क्षमा करना मैं भी तेरा दूध पी के बड़ा हुआ हूँ। जरूरतों की उचित व्याख्या करो.... साला(अपरिप्रक्ष्य). भरे पेट लोग गोबर नहीं खाते। गोबर खाने से स्वास्थ्य बढ़ता है। 

एक बात कहूं? हम सभी तुगलकों को मनोचिकित्सक की जरूरत है...... नहीं-नहीं ये तो हमारे देश की परंपरा ही नहीं है, आर्य हैं हम पगलाते नहीं, जेल ही बढ़िया रहेगा।



http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/09/120912_man_sex_with_buffalo_pn.shtml

Friday, September 7, 2012

डॉक्टर भगवान की paracetamol

बस एक हफ्ते के अन्दर मुझे असिस्टेंट कमांडेंट की शारीरिक दक्षता परीक्षा के लिए दिल्ली जाना था. महीने भर से उसी का प्रयास कर रहा था और पूरी तरह से तैयार भी था. हिन्दुस्तान में रहने वाली युवा पीढी जानती है कि केन्द्रीय सरकार के अधीन नौकरी पाने के लिए कितने पापड बेलने पड़ते हैं. मैं उज्जवल भविष्य से बस एक कदम दूर अपने माता - पिता के सपनो के महल को साकार कर रहा था. अचानक एक हफ्ते पहले मुझे हल्का सा बुखार आने लगा, दूसरे दिन तक ठीक नहीं होने पर नजदीकी मेडिकल स्टोर से दवा ली तो साथ में एक हफ्ते आराम करने की सलाह भी मुफ्त मिली थी. एक हफ्ते का समय न था मेरे पास तो अगले दिन डॉक्टर के पास (इलाहाबाद) शहर के एक प्रसिद्द अस्पताल जा पहुंचा. सरदर्द, उल्टी, दस्त, बदन दर्द कुछ भी नहीं था. डॉक्टर की २ मिनट की तिरस्कार पूर्ण द्रष्टि पाने के लिए 200 रूपये फीस दी. और उस दो मिनट में उसने कुछ रटे हुए से  प्रश्न बुदबुदाए और बिना मेरी बीमारी के बारे में जिज्ञासा के तमाम तरह के टेस्ट लिख डाले. ८ किस्म की खून की जांच, मूत्र की जांच और ultrasound ( लगभग 2000 रुपये). साथ ही कुछ दवाइयां भी लिखीं (450 रुपये). मैंने उसे अपनी सारी परिस्थिति बतायी किन्तु कोई प्रतिक्रया न पा सका. अगले दिन तक मेरी स्थिति और दयनीय हो चुकी थी. मैंने कुछ जागरूकता दिखाई तो पता चला कि उन दवाइयों में से कोई गैस की है कोई सर दर्द की और कोई किसी और मर्ज की  किन्तु बुखार की एक भी दवा न थी. दूसरे दिन डॉक्टर मिले नहीं किन्तु सारी रिपोर्ट नकारात्मक थीं (जिसका मुझे पूर्वाभास था), हालत और बिगड़ी, सर्दी जुकाम, खांसी और सर दर्द सब सुरु हो गया, तीसरे दिन डॉक्टर से मिला (200 रूपये फीस फिर) तो उसने कहा "कोई खास बुखार थोड़े था तुमको, paracetamol नहीं ले सकते थे?"

आज शारीरिक दक्षता परीक्षा की तारीख है. दिल्ली न जा कर शहर से दूर अपने गाँव में, मैं बिस्तर पर लेटा हूँ. मेरी माँ मेरे लिए खिचडी बना रही है और दरवाजे के बाहर रखी कचरे की टोकनी में पडी मेरी वर्षों की मेहनत पूरे घर में दुर्गन्ध फैला रही है....

Sunday, August 19, 2012

....

शोध क्षात्र (फेय्न्मन से): मैं रिसर्च स्कॉलर हूँ, मेरे पास पढने-लिखने-समझने-विचार करने का समय नहीं. वो जमाने लद गए जब तुम अन्वेषण (यथार्थ खोज) भी करते थे और लफंगे बाजी भी.

Tuesday, August 7, 2012

नायक नहीं .....

लम्बे समय तक मुझे लगता था कि आजादी के बाद देश में शायद ही कोई महानायक हो सकता है. वैसे, जयप्रकाश नारायण ने मेरे जन्म से पहले ही मुझे झुठलाया था. किन्तु, हाल ही में देश में कुछ लोगों ने  सुनहरा मौका गँवा दिया. अगर कोई भागे न होते, और कोई उठे न होते तो वो शायद महानायक होते. जीवन की लिप्सा ने अमरत्व पर विजय पायी और कल के उद्धारकर्ता आज धोबी के कुत्ते हो गए. कल दिल दे दिया था ..... कल वोट न दूंगा.  माफ़ करना जतिन.... बस ऐसे ही हो गए हम. 

Monday, June 18, 2012

Pseudo-growth

As far as we see in our near past the economical growth glimpses to be dynamic and hiking, but the consistency in this hike is not an easily achievable task, as Indian government presumes. Though the gross national transaction has enhanced, the gross national happiness or health has trampled. Simple conclusion on the nation's development can be drawn by looking at the ratio of population having health insurance to the gross population. Electronic gadgets are replacing the nutrients in the porringer. The gross transaction capacity is pseudo-improving the livelihood of urban areas, but devastating the basic infrastructure of rural. Government is incapable of or is unwilling to store the cereal, and preferentially buying swine feces. The infrastructural improvement is all about destruction of local market and construction of super-malls. The level of education is drowning and morality has reached to the bottom of legerdemain. The pseudo-developing generation is basically troop of sailors and money-venereal. In the name of science our progressed is strengthening adulteration in edibles and potables. Government funds to defense are 40 times more then research and education; drainage is 100 time more then water harvesting. We are 1/6th of the world population and 82 years have passed to get a Nobel in science. 65 years have passed to independence and nation still don't have notion of nation and it's borderline is different from so called line of control.

Faith in humanity is loosing.... Knavery has become the best policy in the nation of Gandhi...

Conclusion: I am quite scared of nation's pseudo-growth, and If Government  doesn't come out of it's delirium, we will be Zimbabwe, earliest.

(Comment to Public private partnership)
Seriously incomplete..